शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

विष्वषास्त्र: भूमिका


विष्वषास्त्र: भूमिका
(षास्त्र के यथार्थ समझ के लिए रिक्त मस्तिश्क की आवष्यकता)
मनुश्य का प्रत्येक बच्चा निश्पक्ष, पूर्ण, धर्मयुक्त, धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव रूप में ही होता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, बच्चे के पूर्ववर्ती संस्कार, विचारधारा, धारणाएँ व मान्यताएँ उसे बाँधते हुये अपूर्ण, पक्ष व सम्प्रदाययुक्त बना देती है और वह जीवन पर्यन्त उस छवि में बँधकर एक विषेश प्रवृत्ति के मनुश्य के रूप में व्यक्त होता है। यह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार एक नया कम्प्यूटर जिसमें कोई भी एप्लीकेषन साफ्टवेयर न डाला गया हो और फिर उसमें किसी विषेश-विषेश कार्य के लिए एप्लीकेषन साफ्टवेयर डालना षुरू किया जाय तो वह कम्प्यूटर उस विषेश कार्य व प्रवृत्ति वाला बन जाता है जिसका उसमें एप्लीकेषन साफ्टवेयर डाला गया है।
प्रस्तुत ”विष्वषास्त्र: द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज“ मनुश्य के मस्तिश्क के लिए एक ऐसा  साफ्टवेयर है जो उसे पूर्ण और सभी विचारों को समझने में सक्षम बनाता है। यह षास्त्र एक मानक षास्त्र है जिसमें प्रत्येक स्तर का मनुश्य अपनी छवि देख सकता है। उदाहरण स्वरूप जिस प्रकार हम किसी ठोस पदार्थ को किलो से तोलते हैं उसी प्रकार मनुश्य के मस्तिश्क को तोलने का यह षास्त्र है। कभी भी ठोस पदार्थ से किलो को नहीं तोला जाता। हम यह नहीं कहते कि इतना ठोस पदार्थ बराबर एक किलो बल्कि हम यह कहते हैं कि एक किलो बराबर इतना ठोस पदार्थ।
इस षास्त्र को पढ़ने व समझने के पहले पाठकगण अपने मस्तिश्क को नये कम्प्यूटर की भाँति रिक्त कर लें, जिसका मैं निवेदन भी करता हूँ। किसी भी पूर्वाग्रह व संस्कार से ग्रसित होकर पढ़ने पर षास्त्र समझ के बाहर हो जायेगा क्योंकि षास्त्र बहुआयामी (मल्टी डायमेन्सनल) है अर्थात अनेक दिषाओं से एक साथ देखने पर ही इसके ज्ञान का प्रकाष आप में प्रकाषित होगा।
प्रस्तुत षास्त्र किसी धर्म-सम्प्रदाय विषेश की सर्वोच्चता का षास्त्र नहीं है बल्कि सभी को अपने-अपने धर्म-सम्प्रदाय और एक दुसरे के धर्म-सम्प्रदाय के प्रति समझ को विकसित करते हुये ज्ञान व कर्मज्ञान द्वारा एकीकरण का षास्त्र है। एक मात्र ज्ञान व कर्मज्ञान ही ऐसा विशय है जो मनुश्य को मनुश्य से जोड़ सकता है। क्योंकि इसका सम्बन्ध सीधे मस्तिश्क से है और कौन नहीं चाहेगा कि उसका मस्तिश्क ज्ञान-बुद्धि के लिए पूर्णता की ओर बढ़े। ज्ञान-कर्मज्ञान के अलावा जो कुछ है वह संस्कृति है और उस पर एकीकरण असम्भव ही नहीं नामुमकिन है। मैं यह कभी नहीं चाहता कि यह पृथ्वी एक रंगी हो जाये। जिस प्रकार प्रत्येक घर का मालिक अपने बाग में अनेक रंग व प्रकार का फूल इसलिए उगाता है कि उसके बाग की सुन्दरता और निखरे। उसी प्रकार परमात्मा ने इस पृथ्वी पर समय-समय पर उत्पन्न अनेक अवतारों, पैगम्बरों, दूतों इत्यादि के माध्यम से धर्म-सम्प्रदाय उत्पन्न कर मनुश्यों को युगों-युगों से संस्कारित व निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ किया है ताकि उसकी यह पृथ्वी रूपी बाग सुन्दर और रंगबिरंगी लगे और अब वह समय आ चुका है जिसमें मनुश्य को पूर्ण संस्कारित किया जाये। यह जानना आवष्यक है कि यह षास्त्र उस सर्वोच्च और अन्तिम मन स्तर पर जाकर मनुश्य को पूर्ण संस्कारित करने के लिए आविश्कृत किया गया है जैसे कोई व्यक्ति चाँद पर बैठकर अपने इस पृथ्वी रूपी घर को संयुक्त परिवार का रूप देने और बिखरे हुये परिवार के एकीकरण का प्रयास  एक विचारधारा ”सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ द्वारा किया है।
यह षास्त्र वर्तमान तक के सभी अवतारों, महापुरूशों, धर्म-सम्प्रदाय प्रवर्तकों, राश्ट्रीय व वैष्विक विचार व्यक्त करने वाले सामाजिक-धार्मिक-राजनैतिक नेतृत्वकर्ताओं के सकारात्मक विचारों के समन्वय और उसके राश्ट्रीय व वैष्विक षासन प्रणाली के अनुसार स्थापना के लिए एवं मनुश्य जीवन में उसके व्यवहारीकरण का षास्त्र है। किसी भी एक अवतार, महापुरूश, धर्म-सम्प्रदाय प्रवर्तक, राश्ट्रीय व वैष्विक विचार व्यक्त करने वाले सामाजिक-धार्मिक-राजनैतिक नेतृत्वकर्ता के सकारात्मक विचार को लेकर समाज गठन व ”सम्पूर्ण क्रान्ति“ घटित नहीं हो सकती। उसके लिए चाहिए समन्वय। समन्वय का अर्थ ही है-”जिसमें सभी हों, और सभी में वो हो“। षास्त्र में ऐसे बहुत से विचार मिलेगें जो वर्तमान में सत्य व समझ में न दिखाई देती हो परन्तु वह मनुश्य के अपने कर्मो के प्रयोग और उससे प्राप्त ज्ञान के फलस्वरूप अन्त में सत्य सिद्ध होगीं क्योंकि यह षास्त्र सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त पर आधारित है जिससे मनुश्य बाहर नहीं है। इसी कारण से इस षास्त्र को ”अन्तिम ज्ञान का ज्ञान (ज्ीम ज्ञदवूसमकहम व िपिदंस ादवूसमकहम)“ भी कहा गया है और यह भी कहा गया है ”सभी सर्वोच्च विचार एवं सर्वोच्च कर्म मेरी ओर ही आते है“
किसी भी अवतार-महापुरूश इत्यादि का सार्वभौम सत्य ज्ञान एक हो सकता है परन्तु उसके स्थापना की कला उस अवतार-महापुरूश इत्यादि के समय की समाजिक व षासनिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है, जो पुनः दुबारा प्रयोग में नहीं लायी जा सकती। वर्तमान तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिससे यह सिद्ध होता हो कि उस अवतार-महापुरूश इत्यादि की कला को दुबारा प्रयोग कर कुछ सकारात्मक किया गया हो। इस प्रकार पुनर्जन्म और अवतार केवल मानसिक रूप से सिद्ध होता है न कि षारीरिक रूप से।
किसी भी अवतार-महापुरूश इत्यादि के दर्षन या चित्र से अधिकतम लाभ तभी प्राप्त हो सकता है जब उनकी विचार व कृति का ज्ञान व समझ हो। उसी से मनुश्य का विकास सम्भव है। मैं यह चाहूँगा कि मुझसे अधिक महत्व इस ”विष्वषास्त्र“ नामक कृति को समाज दे क्योंकि इसी में उनका विकास है। यह भौतिक षरीर जिसके माध्यम से यह कार्य सम्पन्न हुआ वह तो एक दिन नश्ट हो जायेगा परन्तु यह कृति वर्तमान समाज के संसाधनों व विज्ञान की तकनीकों के सहारे बहुत अधिक समय तक रहेगी। इसे उसी प्रकार समझें जिस प्रकार वर्तमान भौतिक विज्ञान से आविश्कृत पंखा, बल्ब, मोबाइल, कम्प्यूटर इत्यादि का समाज उपयोग करता है न कि इसके आविश्कारकर्ता का दर्षन व चित्र की पूजा। अर्थात यह षास्त्र ही गुरू है न कि इसके आविश्कारक का षरीर। इस कारण से ही मैं जिस षरीर का प्रयोग इस कार्य के लिए किया है, उसका वह एकमात्र रूप ही षास्त्र में दिया हूँ जो ”ज्ञान, कालबोध तथा षब्दब्रह्म“ प्राप्ति की उम्र 28 वर्श की अवस्था का है। वर्तमान में मैं इससे बहुत दूर आ चुका हूँ जहाँ पहचान ही असम्भव है।
प्रत्येक मनुश्य के लिए 24 घंटे का दिन और उस पर आधारित समय का निर्धारण है और यह पूर्णतः मनुश्य पर ही निर्भर है कि वह इस समय का उपयोग किस गति से करता है। उसके समक्ष तीन बढ़ते महत्व के स्तर हंै- षरीर, धन/अर्थ और ज्ञान। इन तीनों के विकास की अपनी सीमा, षक्ति, गति व लाभ है। जिसे यहाँ स्पश्ट करना आवष्यक समझता हूँ-
1. षरीर आधारित व्यापार- यह व्यापार की प्रथम व मूल प्रणाली है जिसमें षरीर के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा व्यापार होता है। इससे सबसे कम व सबसे अधिक धन कमाया जा सकता है। परन्तु यह कम धन कमाने के लिए अधिक लोगों को अवसर तथा अधिक धन कमाने के लिए कम लोगों कांे अवसर प्रदान करता है। अर्थात् षरीर का प्रत्यक्ष प्रयोग कर अधिक धन कमाने का अवसर कम ही लोगों को प्राप्त होता है। यह प्रकृति द्वारा प्राप्त गुणों पर अधिक आधारित होती है। जो एक अवधि तक ही प्रयोग में लायी जा सकती है। क्योंकि षरीर की भी एक सीमा होती है। उदाहरण स्वरुप- किसान, मजदूर, कलाकार, खिलाड़ी, गायक, वादक, पहलवान इत्यादि। जिसमें अधिकतम संख्या कम कमाने वालों की तथा न्यूनतम संख्या अधिक कमाने वालों की है। षरीर आधारित व्यापारी हमेषा धन व ज्ञान आधारित व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। इस व्यापार में षरीर की उपयोगिता अधिक तथा धन व ज्ञान की उपयोगिता कम होती है।
2. धन/अर्थ आधारित व्यापार- यह व्यापार की दूसरी व मध्यम प्रणाली है जिसमें धन के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा व्यापार होता है। इससे अधिक धन कमाया जा सकता है और उन सभी को अवसर प्रदान करता है जिनके पास धन होता है। उदाहरण स्वरुप- दुकानदार, उद्योगपति, व्यापारी इत्यादि। धन आधारित व्यापारी हमेषा षरीर व ज्ञान आधारित व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। इस व्यापार में धन की उपयोगिता अधिक तथा षरीर व ज्ञान की उपयोगिता कम होती है।
3. ज्ञान आधारित व्यापार- यह व्यापार की अन्तिम व मूल प्रणाली है जिसमें ज्ञान के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा व्यापार होता है। इससे सबसे अधिक धन कमाया जा सकता है और उन सभी को अवसर प्रदान करता है जिनके पास ज्ञान होता है। उदाहरण स्वरुप- विद्यालय, महाविद्यालय, विष्वविद्यालय एवं अन्य षिक्षा व विद्या अध्ययन संस्थान, षेयर कारोबारी, बीमा व्यवसाय, प्रणाली व्यवसाय, कन्सलटेन्ट, ज्ञान-भक्ति-आस्था आधारित ट्रस्ट-मठ इत्यादि। ज्ञान आधारित व्यापारी हमेषा षरीर व धन आधारित व्यापारियों पर निर्भर रहते हैं। इस व्यापार में ज्ञान की उपयोगिता अधिक तथा षरीर व धन की उपयोगिता कम होती है।
षरीर के विकास के उपरान्त मनुश्य को धन के विकास की ओर, धन के विकास के उपरान्त मनुश्य को ज्ञान के विकास की ओर बढ़ना चाहिए अन्यथा वह अपने से उच्च स्तर वाले का गुलाम हो जाता है। बावजूद उपरोक्त सहित इस षास्त्र से अलग विचारधारा में होकर भी मनुश्य जीने के लिए स्वतन्त्र है। परन्तु अन्ततः वह जिस अटलनीय नियम-सिद्धान्त से हार जाता है उसी सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को ईष्वर कहते हैं और इसके अंष या पूर्ण रूप को प्रत्यक्ष या प्रेरक विधि का प्रयोग कर समाज में स्थापित करने वाले षरीर को अवतार कहते हैं। तथा इसकी व्याख्या कर इसे व्यक्ति में स्थापित करने वाले षरीर को गुरू कहते हैं। मनुश्य केवल प्रकृति के अदृष्य नियमों को दृष्य में परिवर्तन करने का माध्यम मात्र है। इसलिए मनुश्य चाहे जिस भी विचार में हो वह ईष्वर में ही षरीर धारण करता है और ईष्वर में ही षरीर त्याग देता है, इसे मानने या न मानने से ईष्वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
कोई अवतार किसी सम्प्रदाय, जाति, नारी, पुरूश इत्यादि में भेद-भाव से युक्त होकर कार्य नहीं करते, वे सम्पूर्ण मानव जाति को सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से जोड़ने के लिए कार्य करते हैं। जो मनुश्य विचारषील नहीं हैं वे पषुमानव हैं, जो विचारषील हैं वे मानव हैं। मानवों में भी जो व्यक्तिवादी हैं वे असुर-मानव तथा जो समाजवादी हैं वे देव-मानव हैं। वे मानव जो सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से युक्त हैं वे ईष्वर-मानव हैं। अवतारों का कार्य पषुमानव और मानव को ईष्वर-मानव तक उठाना होता है। अवतारों को किसी सम्प्रदाय या पूर्ववर्ती धर्म से जोड़ देना यह मानवों की अपनी दृश्टि होती है। अवतारों का लक्ष्य सदैव समाज में सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की स्थापना रहा है। उनका लक्ष्य कभी भी ऐष्वर्य युक्त जीवन या नष्वर समाजिक विशय या रक्त-रिष्ता-धन सम्बन्ध से लगाव नहीं रहा है। षरीर धारण के धर्म के लिए इन सबकी आवष्यकता मात्र साधन स्वरूप अवष्य रहा है परन्तु लक्ष्य या साध्य स्वरूप कभी नहीं रहा है। चूँकि अवतार भी षरीरधारी ही होते हैं इसलिए समाज के मानव भी अपने-अपने प्रिय वस्तु के लगाव की भाँति उन्हें भी उसी में लिप्त दिखाई पड़ते हैं।
निराकार विचार के समान सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का भी अपना कोई गुण नहीं होता। जब वह पूर्णरूपेण किसी साकार षरीर से व्यक्त होता है तब उसका गुण एकात्म ज्ञान, एकात्म वाणी, एकात्म प्रेम, एकात्म कर्म, एकात्म समर्पण और एकात्म ध्यान के सर्वोच्च संयुक्त रूप में व्यक्त होता है। चूँकि पुनः इन गुणों का अलग-अलग कोई रूप नहीं होता इसलिए इन गुणों से युक्त करते हुये समाज के परिवर्तक और नियंत्रक ऋृशि-मुनि गणों ने मानक चरित्रों का साकार निरूपण या प्रक्षेपण किये। जैसे एकात्म ज्ञान व एकात्म वाणी से युक्त ब्रह्मा परिवार, एकात्म ज्ञान-एकात्म वाणी सहित एकात्म प्रेम व एकात्म कर्म से युक्त विश्णु परिवार, एकात्म ज्ञान-एकात्म वाणी-एकात्म प्रेम-एकात्म कर्म सहित एकात्म समर्पण व एकात्म ध्यान से युक्त षिव-षंकर परिवार। क्रमषः ये आदर्ष मानक व्यक्ति चरित्र, आदर्ष मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र व आदर्ष मानक वैष्विक व्यक्ति चरित्र के रूप में प्रस्तुत किये गये। इस प्रस्तुतीकरण से ही सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित अवतारों का सनातन धर्म, हिन्दूधर्म के रूप में अलग हो नये पहचान को प्राप्त किया। फलस्वरूप अवतारों को भी इन्हीं मानक चरित्रों के अवतार के रूप में जाना जाने लगा और अवतारों का वर्तमान में अवनति होकर  केवल हिन्दूधर्म का माना जाने लगा। इस प्रकार अवतारों द्वारा व्यक्त षास्त्र-साहित्य जो मानव समाज के लिए थी उसे हिन्दूधर्म का समझा जाने लगा जिसका उदाहरण श्री कृश्ण द्वारा व्यक्त ”गीता“ है। उपरोक्त मानक चरित्रों के क्रम में आदर्ष मानक व्यक्ति चरित्र के पूर्णावतार श्रीराम तथा आदर्ष मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र (व्यक्तिगत प्रमाणित आदर्ष मानक वैष्विक व्यक्ति चरित्र) के पूर्णावतार श्रीकृश्ण हो चुके हैं। अब केवल अन्तिम सार्वजनिक प्रमाणित आदर्ष मानक वैष्विक व्यक्ति चरित्र के पूर्णावतार ही षेश हैं जिसका विस्तृत विवरण इस षास्त्र में प्रस्तुत किया गया है।
जिस प्रकार वर्तमान व्यावसायिक-समाजिक-धार्मिक इत्यादि मानवीय संगठन में विभिन्न पद जैसे प्रबन्ध निदेषक, प्रबन्धक, षाखा प्रबन्धक, कर्मचारी, मजदूर इत्यादि होते हैं और ये सब उस मानवीय संगठन के एक विचार जिसके लिए वह संचालित होता है, के अनुसार अपने-अपने स्तर पर कार्य करते हैं और वे उसके जिम्मेदार भी होते हैं। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ईष्वरीय संगठन है जिसमें सभी अपने-अपने स्तर व पद पर होकर जाने-अनजाने कार्य कर रहें हैं। यदि मानवीय संगठन का कोई कर्मचारी दुर्घटनाग्रस्त होता है तो उसका जिम्मेदार उस मानवीय संगठन का वह विचार नहीं होता बल्कि वह कर्मचारी स्वयं होता है। इसी प्रकार ईष्वरीय संगठन में भी प्रत्येक व्यक्ति की अपनी बुद्धि-ज्ञान-चेतना-ध्यान इत्यादि गुण ही उसके कार्य का फल देती है जिसका जिम्मेदार वह व्यक्ति स्वयं होता है न कि ईष्वरीय संगठन का वह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त। मानवीय संगठन का विचार हो या ईष्वरीय संगठन का सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त यह दोनों ही कर्मचारी के लिए मार्गदर्षक नियम है। जिस प्रकार कोई मानवीय संगठन आपके पूरे जीवन का जिम्मेदार हो सकता है उसी प्रकार ईष्वरीय संगठन भी आपके पूरे जीवन का जिम्मेदार हो सकता है। जिसका निर्णय आपके पूरे जीवन के उपरान्त ही हो सकता है परन्तु आपके अपनी स्थिति के जिम्मेदार आप स्वयं है। जिस प्रकार मानवीय संगठन में कर्मचारी समर्पित मोहरे की भाँति कार्य करते हैं उसी प्रकार ईष्वरीय संगठन में व्यक्ति सहित मानवीय संगठन भी समर्पित मोहरे की भाँति कार्य करते हैं, चाहे उसका ज्ञान उन्हें हो या न हो। और ऐसा भाव हमें यह अनुभव कराता है कि हम सब जाने-अनजाने उसी ईष्वर के लिए ही कार्य कर रहें है जिसका लक्ष्य है- ईष्वरीय मानव समाज का निर्माण जिसमें जो हो सत्य हो, षिव हो, सुन्दर हो और इसी ओर विकास की गति हो।
ईष्वर सम्बन्धित विचार और उस पर आधारित पूजास्थल, प्रवचन इत्यादि अब एक आयोजन व सामाजिक छवि बदलने का रूप ले चुका है। अब आवष्यकता यह है कि उसे दृढता प्रदान करने के लिए व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान से युक्त कर दिया जाये जो ज्ञान-कर्मज्ञान से ही आ सकता है और इसी से सभी धर्म व जाति का सत्य कल्याण हो सकता है। जिस वृक्ष से षाखाएं निकल चुकी हों पुनः तने में वापस नहीं भेजी जा सकती। आवष्यकता यह है कि हम उसके तने को और मजबूती प्रदान करें। इसी प्रकार ईष्वर सम्बन्धित व्यापार न तो कभी बन्द हो सकता है और न ही बन्द होता है जिसके सामने सभी व्यापार छोटे व अस्थिर हैं।
यह युग आॅकड़ो (डाटा), सूचनाओं, आरेख, ग्राॅफ व इंजिनियरिंग का युग है इसलिए यह षास्त्र भी उसी रूप में प्रस्तुत है। क्योंकि युग का बहुमत मन (अधिकतम मन) जिस ओर बढ़ चुका होता है ज्ञान को गति देने के लिए उसी कला का प्रयोग किया जाता है। इसलिए उन लोगों से मैं क्षमा चाहता हूँ जो यह उम्मीद किये होगें कि षास्त्र सदैव कविताओं, छन्दों, दोहो व संस्कृत भाशा में ही हो सकता है। संस्कृत भाशा में षास्त्रीय मन्त्रों के गायन के उस षक्ति को मैं स्वीकार करता हूँ जिसके सुनने पर रोम-रोम झंकरित हो उठता है। हो सकता है ऐसा मुझे इसलिए लगता हो कि अनेको जन्मों से यह मेरे पूर्व संस्कारों में समाहित है। भाशा तो ज्ञान को व्यक्त करने का माध्यम मात्र है। कई भाशाओं का ज्ञानी होना अच्छी बात है लेकिन उससे भी अच्छी बात ज्ञान का ज्ञानी होना है। प्रस्तुत षास्त्र में वर्तमान विष्व षासन व्यवस्था के अनुसार स्थापना स्तर तक का विष्लेशण उपलब्ध है। जिसके 90 प्रतिषत भाग से सभी परिचित ही हैं। षेश 10 प्रतिषत भाग दृश्टि, काल (समय), ध्यान व चेतना की स्थिति और ज्ञान-कर्मज्ञान का वर्तमान विष्व षासन व्यवस्था के अनुसार रूपान्तरण है। यह ऐसे था कि घर बनाने के लिए सारा निर्माण कार्य पहले ही पूर्ण किया जा चुका था सिर्फ छत डालना था, यह षास्त्र वही छत है जो पूर्ण किया गया है और अब इस छत के नीचे और भी सुन्दरता के लिए सम्बन्धित विशय के विषेशज्ञों के सहयोग के लिए सदा ही स्वागत रहेगा। आज तक षास्त्रों के प्रति दृश्टि यह रहीं है कि ये सब रहस्यवाद का विशय है ऐसा नहीं है। सिर्फ दृश्टि की बात है कि आप किस दृश्टि से उसे समझने का प्रयत्न करते हैं। भाशा के अक्षर व षब्द तो वही होते हैं सिर्फ चिन्तन स्तर और षब्दों का अर्थ ही उसे कठिन व आसान भाशा षैली में विभाजित करता है।
समाज के व्यक्ति यह भी कह सकते हैं कि मैं ”भारत“ के संस्कृति व संस्कारों के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ। तो मैं उन लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि मैं उस ”भारत“ के संस्कृति व संस्कारों के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जिसने विष्व का सर्वप्रथम, प्राचीन और वर्तमान तक अकाट्य ”क्रिया-कारण“ दर्षन कपिल मुनि के माध्यम से दिया जिसे आज का दृष्य विज्ञान (पदार्थ या भौतिक विज्ञान) ने भी आइन्सटाइन के माध्यम से म्त्रउब2 देकर और दृढ़ता ही प्रदान की है। मैं उस भारत के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जहाँ ऐसी प्रत्येक वस्तु जिससे मनुश्य जीवन पाता है और ऐसी प्रत्येक वस्तु जिससे मनुश्य का जीवन संकट में पड़ सकता है उसे देवता माना जाता है। इस प्रकार हमारे भारत में 33 करोड़ देवता पहले से ही हैं। इस प्रकार हमारा भारत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ही देवता और ईष्वर के रूप में देखता व मानता है और इसकी व्यवस्था हेतू कर्म करता रहा है। मैं उस ”भारत“ के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जिसने ”षून्य“ व ”दषमलव“ दिया जिसपर विज्ञान की भाशा गणित टीकी हुई है। मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं उस ”भारत“ के संस्कृति व संस्कारों के पूर्वाग्रह से ग्रसित हूँ जिसका अपनी भाशा में नाम ”भारत“ है तथा विष्वभाशा में नाम ”प्छक्प्।“ है। मैं ”प्छक्प्।“ का विरोध नहीं करता बल्कि भारत को विष्यभारत बनाकर नाम ”प्छक्प्।“ को पूर्णता प्रदान करना चाहता हूँ। मैं संकुचन में नहीं बल्कि व्यापकता में विष्वास करता हूँ। मैं अंष में नहीं बल्कि पूर्णता, समग्रता व सार्वभौमिकता में विष्वास करता हूँ। समग्र ब्रह्माण्ड निरन्तर फैल रहा है। मानव जाति को भी अपने मस्तिश्क और हृदय को फैला कर विस्तृत करना होगा तभी विकास, षान्ति, एकता व स्थिरता आयेगी। तो मैं उन लोगों से कहना चाहता हूँ कि भारत को समझने के लिए ”भारत माता“ में जन्म लेना पड़ता है और ”भारत माता“ आलीषान कोठीयों में नहीं गाँवो, झोपड़ियों व जंगलों में मिलती हैं और वहीं जाना पड़ता है। इतिहास साक्षी है ऐसा ही हुआ है। केवल पुस्तकों को पढ़कर भारत को जानना असम्भव है। भारत की समझ कोई प्रापर्टी (धन-दौलत) नहीं जो विरासत में ले ली जाये, यह अनेक जन्मों का फल होता है।
सन् 1893 से सन् 1993 के 100 वर्शो के समय में विष्व के बौद्धिक षक्ति को जिन्होंने सबसे अधिक हलचल दी वे हैं- धर्म की ओर से स्वामी विवेकानन्द और धार्मिकता की ओर से आचार्य रजनीष ”ओषो“। मनुश्य जिस प्रकार भौतिक विज्ञान के नवीन आविश्कारों को आसानी से ग्रहण करता है उसी प्रकार धर्म-आध्यात्म-दर्षन के नवीन आविश्कारों को भी मनुश्य को ग्रहण करना चाहिए, तभी मानसिक-आध्यात्मिक स्वतन्त्रता का अनुभव हो सकेगा। अन्यथा पूर्ण षारीरिक गुलामी का समय बीत चुका, आर्थिक गुलामी का काल चल रहा है और मानसिक गुलामी के काल चक्र में मनुश्य फँस जायेगा। स्वामी विवेकानन्द जी का कहना था-”उसी मूल सत्य की फिर से षिक्षा ग्रहण करनी होगी, जो केवल यहीं से, हमारी इसी मातृभूमि से प्रचारित हुआ था। फिर एक बार भारत को संसार में इसी मूल तत्व का-इसी सत्य का प्रचार करना होगा। ऐसा क्यों है? इसलिए नहीं कि यह सत्य हमारे षास्त्रों में लिखा है वरन् हमारे राश्ट्रीय साहित्य का प्रत्येक विभाग और हमारा राश्ट्रीय जीवन उससे पूर्णतः ओत-प्रोत है। इस धार्मिक सहिश्णुता की तथा इस सहानुभूति की, मातृभाव की महान षिक्षा प्रत्येक बालक, स्त्री, पुरुश, षिक्षित, अषिक्षित सब जाति और वर्ण वाले सीख सकते हैं। तुमको अनेक नामों से पुकारा जाता है, पर तुम एक हो।“ (जितने मत उतने पथ, रामकृश्ण मिषन, पृश्ठ-39)। आचार्य रजनीष ”ओषो“ का कहना था-कृश्ण का महत्व अतीत के लिए कम भविश्य के लिए ज्यादा है। सच ऐसा है कि कृश्ण अपने समय से कम से कम पाँच हजाार वर्श पहले पैदा हुये। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं और सभी गैर महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। बस महत्वपूर्ण और गैर महत्वपूर्ण में इतना फर्क है और सभी साधारण व्यक्ति अपने समय के साथ पैदा होते हैं महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझना आसान नहीं होता । उसका वर्तमान और अतीत उसे समझने में असमर्थता अनुभव करता है जब हम समझने योग्य नहीं हो पाते तब हम उसकी पूजा षुरु कर देते हैं या तो हम उसका विरोध करते हैं। दोनों पूजाएं हैं एक मित्र की एक षत्रु की।“, ”इस देष को कुछ बाते समझनी होगी। एक तो इस देष को यह बात समझनी होगी कि तुम्हारी परेषानियों, तुम्हारी गरीबी, तुम्हारी मुसीबतों, तुम्हारी दीनता के बहुत कुछ कारण तुम्हारे अंध विष्वासों में है, कम से कम डेढ़ हजार साल पिछे घिसट रहा है। ये डेढ़ हजार साल पूरे होने जरूरी है। भारत को खिचकर आधुनिक बनाना जरूरी है। मेरी उत्सुकता है कि इस देष का सौभाग्य खुले, यह देष भी खुषहाल हो, यह देष भी समृद्ध हो। क्योंकि समृद्ध हो यह देष तो फिर राम की धुन गुंजे, समृद्ध हो यह देष तो फिर लोग गीत गाँये, प्रभु की प्रार्थना करें। समद्ध हो यह देष तो मंदिर की घंटिया फिर बजे, पूजा के थाल फिर सजे। समृद्ध हो यह देष तो फिर बाँसुरी बजे कृश्ण की, फिर रास रचे! यह दीन दरिद्र देष, अभी तुम इसमें कृश्ण को भी ले आओंगे तो राधा कहाँ पाओगे नाचनेवाली? अभी तुम कृश्ण को भी ले आओगें, तो कृश्ण बड़ी मुष्किल में पड़ जायेगें, माखन कहाँ चुरायेगें? माखन है कहाँ? दूध दही की मटकिया कैसे तोड़ोगे? दूध दही की कहाँ, पानी तक की मटकिया मुष्किल है। नलो पर इतनी भीड़ है! और एक आध गोपी की मटकी फोड़ दी, जो नल से पानी भरकर लौट रही थी, तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा देगी कृश्ण की, तीन बजे रात से पानी भरने खड़ी थी नौ बजते बजते पानी भर पायी और इन सज्जन ने कंकड़ी मार दी। धर्म का जन्म होता है जब देष समृद्ध होता है। धर्म समृद्ध की सुवास है। तो मैं जरूर चाहता हँू यह देष सौभाग्य षाली हो लेकिन सबसे बड़ी अड़चन इसी देष की मान्यताएं है। इसलिए मैं तुमसे लड़ रहा हँू। तुम्हारे लिए।“
वर्तमान में जीने का अर्थ होता है-विष्व ज्ञान जहाँ तक बढ़ चुका है वहाँ तक के ज्ञान से अपने मस्तिश्क को युक्त करना। तभी डेढ़ हजार वर्श पुराने हमारे मस्तिश्क का आधुनिकीकरण हो पायेगा। सिर्फ वर्तमान में तो पषु रहकर कर्म करते हैं। यह षास्त्र मनुश्य के मस्तिश्क के आधुनिकीकरण का षास्त्र है या विज्ञान की भाशा में कहें तो मस्तिश्क के आधुनिकीकरण का साफ्टवेयर या माइक्रो चिप्स (प्दजमहतंजमक ब्पतबनपज.प्ण्ब्ण्) है। वर्तमान की अब नवीनतम परिभाशा है-पूर्ण ज्ञान से युक्त होना और कार्यषैली की परिभाशा है-भूतकाल का अनुभव, भविश्य की आवष्यकतानुसार पूर्णज्ञान और परिणाम ज्ञान से युक्त होकर वर्तमान समय में कार्य करना।
अपनें सम्पर्को व समाज के व्यक्तियों से मुझे यह भी सूचना प्राप्त हुई कि दुनिया बहुत तेज (फास्ट) हो गई है। 1000 पृश्ठ का पुस्तक पढ़ने का समय किसके पास है? मुझे बहुत ही आष्चर्य होता है। एक तरफ मनुश्य के पूरे मस्तिश्क को आधुनिक करना है जिसके न होने से वह अपने कर्मो का जिम्मेदार ईष्वर को बनाता है, दूसरी तरफ उसे पढ़ने का समय नहीं है। तो मैं उनसे कहता हूँ मार्ग या रास्ता बनाने वाला, मार्ग इसलिए बनाता है कि लोग उसपर चलकर अपनी मंजिल तय करेगें। बस उसका इतना ही धर्म होता है। चलने वाला अगर न चले तो मार्ग बनाने वाला दोशी नहीं होता और वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त भी होता है। मैंने सिर्फ मार्ग बनाया है जो इस षास्त्र के रूप में आपके सामने है। हाँ इतना जरूर करूँगा कि मार्ग बन गया है इसकी सूचना समाज में अधिकतम क्षेत्र तक पहुँचाने की कोषिष करूँगा। मेरा यही कर्म है जिसे मैं करूँगा। एक व्यक्ति सामान्यतः यदि स्नातक (ग्रेजुएषन) तक पढ़ता है तो वह कितने पृश्ठ पढ़ता होगा और क्या पाता है? विचारणीय है। एक व्यक्ति इंजिनियर व डाॅक्टर बनने तक कितना पृश्ठ पढ़ता है? यह तो होती है कैरियर की पढ़ाई इसके अलावा कहानी, कविता, उपन्यास, फिल्म इत्यादि के पीछे भी मनुश्य अपना समय मनोरंजन के लिए व्यतीत करता है। और सभी एक चमत्कार के आगे नतमस्तक हो जाते हैं तो पूर्ण मानसिक स्वतन्त्रता कहाँ है? विचारणीय विशय है। वैसे भी मैं यहाँ स्पश्ट कर देना चाहता हूँ कि यह षास्त्र तो ज्ञान-कर्मज्ञान का षास्त्र है जो प्रत्येक व्यक्ति की वर्तमान की आवष्यकता है और उसकी महत्ता धीरे-धीरे ही सही परन्तु भविश्य में बढ़ती ही जायेगी। मैंने जहाँ तक देखा है कि ऐसे व्यक्ति जिनका धनोपार्जन व्यवस्थित चल रहा है वे ज्ञान की आवष्कता या उसके प्राप्ति की आवष्यकता के प्रति रूचि नहीं लेते परन्तु वे भूल जाते हैं कि ज्ञान की आवष्यकता तो उन्हें ज्यादा है जिनके सामने भविश्य पड़ा है और उन्हें आवष्यकता है जो देष-समाज-विष्व के नीति का निर्माण करते हैं। मैंने एक आधार तैयार किया है जिससे आने वाली पीढ़ी और विष्व निर्माण के चिन्तक दोनों को एक दिषा प्राप्त हो सके। वे जो मषीनवत् लग गये हैं वे जहाँ लगे हैं सिर्फ वहीं लगे रहें, आखिर में वे भी तो संसार के विकास में ही लगे है उन्हें न सही उनके बच्चों को तो ज्ञान की जरूरत होगी। जिसके लिए वे एक लम्बा समय और धन उनपर खर्च करते हैं।
मैं ही इस षास्त्र का विचारक हूँ, आविश्कारक हूँ, प्रारूप एवं स्थापनार्थ नीति निर्धारणकर्ता हूँ, लिपिबद्धकर्ता हूँ, सम्पादक हूँ, यहाँ तक कि कम्प्यूटराइज्ड टाइप सेटिंगकर्ता भी हूँ और इसमें मैं स्वयं हूँ। मैंने इस षास्त्र के माध्यम से स्वयं को ”अन्तिम, पूर्णावतार और महावतार कल्कि“, जिसे विभिन्न नामों से पहले ही समाज ने सम्बोधित कर रखा है, प्रस्तुत किया है। और वह इसलिए भी किया है कि मेरे जीवन, ज्ञान व कर्म तथा संसार-समाज में उपलब्ध आॅकड़े इस ओर ही निर्देष करते हैं और उसे मैने पूरी ईमानदारी,  निश्पक्षता और सर्वव्यापकता के साथ प्रस्तुत किया है। यह पद समाज का एक मात्र सर्वोच्च और अन्तिम पद है जो मेरे षरीर धारण के पूर्व ही समाज द्वारा सृजित है। जिस पर कोई भी योग्यता प्रस्तुत कर अपने को स्थापित कर सकता है। जिसका निर्णय वोटो (मत पत्रो या एस.एम.एस) द्वारा नहीं बल्कि योग्यता द्वारा तय होना है। जिसके अनेक स्वघोशित दावेदार है। इन्टरनेट पर ”कल्कि अवतार“ सर्च कर देखा जा सकता है। उनमें से एक मैं भी हूँ- नाम, रूप, गुण, कर्म  से योग्य और ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यह सब मेरे द्वारा इस जीवन में अर्जित किया गया है। इस षास्त्र के माध्यम से मैंने इसे सिद्ध किया है और जिसे समाज के मुझे जानने वाले देख भी रहे हैं। और मैं सत्य रूप में यही हूँ-मानो या न मानो या जब समझ में आये तभी से मानो या न भी भी मानो तो कम से कम व्यक्ति, देष व विष्व के विकास के लिए कुछ उपयोगी हो तो ग्रहण कर लो, या जो समझ में आये वो करो। प्रत्येक विशय के दो पहलू होते हैं और वे एक दूसरे को पूर्णता प्रदान करते है। अंधकार है तो प्रकाष है, मुद्रा जिसके पीछे मनुश्यों का सारा जीवन संघर्शमय रहता है वह भी दोनो तरफ से सत्य न हो तो बेकार होता है। इसी प्रकार साकार है तो निराकार है, निराकार है तो साकार है। चाहे तो मुझे साकार विष्वात्मा समझ सकते हो। कुछ नहीं समझ सकते तो षातिर अपराधी, भ्रश्टाचारी, आंतकवादी की तरह इस समस्त अस्तित्व के भोग के लिए योगमाया का प्रयोग करने वाला षातिर चालाक, बुद्धिमान और महत्वाकंाक्षी तो समझ ही सकते हो, लेकिन कुछ न कुछ तो समझना ही पड़ेगा। क्योंकि कार्य रूप में यह षास्त्र आपके समक्ष है तो कारण को कुछ न कुछ तो नाम देना ही पड़ेगा। हम सभी श्रीराम और श्रीकृश्ण के होने न होने पर अन्तहीन तर्क व बहस प्रस्तुत कर सकते हैं परन्तु वाल्मिकी, महर्शि व्यास और गोस्वामी तुलसीदास के न होने पर पर तर्क नहीं दे सकते क्योंकि उनकी कृति क्रमषः रामायण, महाभारत और रामचरित मानस हमारे समक्ष उपस्थित है। इन कृतियों में उनके नायक उनसे अलग थे इसलिए नायक का होना, न होना तर्क का विशय था परन्तु इस ”विष्वषास्त्र“ का नायक और इसका रचनाकार मै स्वयं हूँ। अब यह भी एकीकृत है।
100 प्रतिषत साकार से साकार का युद्ध श्रीराम कर चुके है। 50-50 प्रतिषत साकार और निराकार का युद्ध श्रीकृश्ण कर चुके हैं। अब 100 प्रतिषत निराकार से निराकार का युद्ध का क्रम है और इस युद्ध से जो प्रकाषमय चिंगारी निकलेगी, उससे इस मार्ग की सूचना सभी को मिलेगी और मार्ग दिखाई देगा, जिसपर मानव अपनी ईष्वरीय मानव बनने की यात्रा प्रारम्भ करेंगें। यह युद्ध आवष्यक है क्योंकि अवतारों को पहचानना, जानना और मानना स्वयं मनुश्यों के भी वष की बात नहीं। इतनी आसानी से पहचानना, जानना और मानना हो जाता तो न रामायण होती, न महाभारत होता और न ही विष्वभारत समाहित यह विष्वषास्त्र होता। ध्यान देने के योग्य यह है कि- सत्य से कुछ भी नहीं छोड़ा जा सकता और सत्य के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है।
मुझे कभी भी ऐसा कोई खेल पसन्द नहीं था जिसमें बार-बार हार और जीत होती रहे। मैंने एक यही खेल खेला-एक बार हार या एक बार जीत जिसके लिए मैंने अपने जीवन के 18 वर्श (सन् 1994-2011) सभी सांसारिक कर्म को करते हुये लगाये। जिसमें इस कार्य का मुख्य कार्यकाल अक्टुबर, 1995 से दिसम्बर, 2001 तक (षास्त्र का मूल सिद्धान्त का लेखन समय) तथा जुलाई, 2010 से अब तक चल रहा है। इस समय में हमारे हम उम्र परिचितो में से अनेक ने अच्छी नौकरी व अच्छा धन अर्जित किया। उनको देखकर मुझे बहुत खुषी होती है। जब भी उन्हें यह पता चले कि मैंने यह कार्य किया है और उनका एक परिचित भी ”अन्तिम अवतार“ के ओलम्पिक खेल का एक प्रतिभागी है तो उन्हें भी खुषी होगी ऐसी आषा करता हूँ। बहुत से मेरे परिचित व्यक्ति जो मुझसे सिर्फ परिचित हैं, उनका कोई योगदान इस सकारात्मक श्रृंखला के योग्य नहीं हो सका इसका मुझे दुःख है। मेरे अनेक षुभचिन्तक समय-समय पर मुझे अनेक जीवकोपार्जन के उपाय सुझाते रहे, जिससे मैं एक सुखमय जीवन प्राप्त कर सकूँ। मैं उनका सदैव आभारी हूँ परन्तु उनके सुझावों पर मैं कभी नहीं चल पाया इसका मुझे दुःख है। मैं ”कल्कि अवतार“ के योग्य हूँ या नहीं यह बाद की बात है लेकिन वर्तमान में इससे यह लाभ है कि समाज इस पद की योग्यता के लिए चर्चा व चिंतन अवष्य करेगा जिसका फल ज्ञान के विकास के रूप में समाज को प्राप्त होगा। मेरे विचार से ¹नेषनल साइबर ओलंपियाड (छब्व्)“ , ¹नेषनल साइंस ओलंपियाड (छैव्)“, ¹इन्टरनेषनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड (प्डव्)“ ¹इन्टरनेषनल इंग्लिष ओलंपियाड (प्म्व्)“ की भाँति ¹विष्व कल्कि ओलंपियाड (ॅज्ञव्)“ का भी आयोजन होना चाहिए जिससे इस विष्व के एकीकरण, षान्ति, एकता, स्थिरता, विकास, सुरक्षा, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग व पूर्ण षिक्षा के  लिए मस्तिश्क की खोज हो सके।
इस छोटे से कार्य को सम्पन्न करने में सबसे आसान बात यह थी कि प्रत्येक मनुश्य अपनी-अपनी आवष्यकताओं को प्राप्त करने के लिए इतना अधिक व्यस्त था कि वह व्यापक सार्वजनिक सोच से बहुत दूर हो चुका था। जो नौकरी पेषा थे वे कार्य किये, वेतन लिए और षेश समय वेतन वृद्धि और उससे सम्बन्धित चर्चा में ही व्यस्त रहते थे। जो विष्वविद्यालयों के प्रोफेसर-लेक्चरर थे वे केवल अपना कर्तव्य निर्वाह कर रहे थे। वे विचारक थे परन्तु खोज के लिए त्यागी न थे। जो विद्यार्थी थे वे उतना ही ज्ञान प्राप्त इसलिए कर रहे थे जितने से वे एक अच्छा कैरियर प्राप्त कर अपने सुनहरे सपनों को साकार कर सकें। जो धर्माचार्य थे वे केवल वही पुराने षास्त्रों पर ही व्याख्यान करने में व्यस्त थे। जो राजनेता थे उन्हें सिर्फ वोट बैंक व पद की चिन्ता थी और आम जनता चुपचाप सभी को ढोने में व्यस्त थी, जितना वजन लाद दो सब ढोने के लिए तैयार और उम्मीद सरकार से। समय बदल चुका है अब विष्व-भारत को नये महापुरूश की आवष्यकता है। जो जिस विशय के लिए अपना समय खर्च करता है, समय भी उसी विशय में उसे फल देता है। मेरे जीवन की यह एक अलग यात्रा इसी षास्त्र के पीछे समय खर्च करने में लगी और समय ने फलरूप से यह षास्त्र दिया है।
यह पृथ्वी, मन्दिर रूपी मेरा घर है जहाँ सोने व भोजन के लिए गुरूद्वारा है, समय से जोड़ने के लिए मस्जिद की पुकार है, प्रेम व कर्म करने के लिए सारी पृथ्वी है और गलती हो तो प्रायष्चित करने के लिए गिरजाघर (चर्च) है। ऐसे घर में कौन नहीं रहना चाहेगा? मैं तो इस घर में आने के लिए हजारों वर्शो से प्रतीक्षा कर रहा था और अब मैं आकर संतुश्ट, सुखी और मुक्ति की कामना के लिए आष्वस्त हूँ।
अब आने वाले समय में जब भी एक आदर्ष वैष्विक समाज का निर्माण करना हो तो किसी भी देष या विष्व के लिए राश्ट्रीय-वैष्विक गीत या गान ऐसा होना चाहिए जो नागरिकों में कत्र्तव्य और जोष की भावना का संचार करने वाली हो, न कि गुणगान, अभिनन्दन, भक्ति, हीनता, भाग्यवाद और अकर्मण्यता की भावना भरने वाली। अपराधिक कानून षारीरिक, आर्थिक व मानसिक अपराध के बढ़ते क्रम में कड़े दण्ड देने वाली  और न्याय की समय सीमा में बद्ध हो। इसी आधार पर नागरिको के उनके विकास के लिए विषेश अधिकार प्राप्त हो जो स्त्री-पुरूश के भेद-भाव से मुक्त हो। साथ ही पूर्णज्ञान का ज्ञानार्जन सबके लिए खुला हो। सभी जीवों की भाँति मनुश्य को भी भोजन का जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त हो। साथ ही ऐसे तमाम बिन्दुओं को खोला जाय जहाँ धन के आदान-प्रदान की गति बाधित हो रही हो या इकट्ठा हो रहा हो क्योंकि आदान-प्रदान ही विकास है, रूकना ही विनाष है।
इस षास्त्र के माध्यम से निम्नलिखित अन्तिम सत्य ज्ञान को प्रसारित व स्थापित करने की कोषिष की गई है-
1. विष्व आत्मा या विष्व मन या एकात्म या सार्वभौम आत्मा जिसे ईष्वर या षिव या ब्रह्म भी कहते है, सर्वत्र विद्यमान है। इसे ही वर्तमान में सर्वमान्य रूप से सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त कहा जा रहा है और इसे समझाने या अनुभूति कराने वाले षास्त्र को विष्वषास्त्र।
2. सार्वभौम सत्य से सार्वभौम सिद्धान्त तक की यात्रा का मार्ग ईष्वरीय मार्ग है। जिसे समय-समय पर मानवीय षरीर के माध्यम से व्यक्त कर समाज में स्थापित करने वाले षरीर को अवतार कहते हैं और अवतार द्वारा दी गयी व्यवस्था को व्यक्ति में स्थापित करने वाले को गुरू कहते हैं।
3. ईष्वर या अवतार सम्पूर्ण मानव जाति सहित ब्रह्माण्डीय कल्याण के लिए कर्म करने के लिए व्यक्त होते हैं न कि किसी कथित वर्तमान किसी विषेश धर्म की सर्वोच्चता के लिए।
4. कथित वर्तमान विषेश-विषेश धर्म उसी ईष्वर को अपने-अपने संस्कृति की दृश्टि से देखते व निरूपित करते हैं।
5. कोई भी अवतार अपने जीवन काल में कोई नई व अलग सामाजिक व्यवस्था या संस्कृति की स्थापना नहीं करता बल्कि वह अपने पूर्व के अवतार के कार्यो को ही आगे बढ़ाता है। इस प्रकार प्रत्येक अवतार अपने पूर्व के अवतार का पुनर्जन्म ही होता है और उसका अन्तिम लक्ष्य सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को पूर्ण प्रकाषित कर उसके द्वारा ईष्वरीय समाज का निर्माण करना होता है।
6. अवतार सार्वभौम आत्मा या सार्वभौम मन का रूप होता है। इसलिए उसका ”मैं“ का सम्बोधन संयुक्त या समन्वय या सार्वभौम को सम्बोधित होता है और इस ओर गति करने वाला प्रत्येक मानव महापुरूश या ईष्वर के रूप में स्थापित होता रहता है।
7. अन्तः सूक्ष्म अदृष्य विशयों पर केन्द्रित मन अदृष्य काल में स्थित मानव की स्थिति है तथा बाह्य स्थूल दृष्य विशयों पर केन्द्रित मन दृष्य काल में स्थित मानव की स्थिति है
8. अन्तः सूक्ष्म अदृष्य विशय द्वारा ईष्वर या आत्मतत्व की अनुभूति कराने वाले षास्त्र को व्यक्तिगत प्रमाणित विष्वषास्त्र तथा बाह्य स्थूल दृष्य विशय द्वारा ईष्वर या आत्मतत्व की अनुभूति कराने वाले षास्त्र को सार्वजनिक प्रमाणित विष्वषास्त्र कहते हैं। इस प्रकार श्री कृश्ण द्वारा व्यक्त व व्यास रचित ”गीता या गीतोपनिशद्“ व्यक्तिगत प्रमाणित विष्वषास्त्र है तथा यह षास्त्र सार्वजनिक प्रमाणित ”गीता या गीतोपनिशद्“ या ”विष्वषास्त्र“ है।
9. काल और युग का निर्धारण किसी पूर्व निर्धारित समय सीमा या तिथि द्वारा नहीं बल्कि अधिकतम मानव के मन के केन्द्रित स्थिति द्वारा निर्धारित होती है।
10. ईष्वर नाम उस षब्द को कहते हैं जिसके माध्यम से उस ईष्वर या आत्मतत्व को जाना जाता है। अदृष्य काल में यह अदृष्य ईष्वर नाम तथा दृष्य काल में यह दृष्य ईष्वर नाम के रूप में व्यक्त होता है।
11. परिवर्तन या आदान-प्रदान या ज्तंदेंबजपवद या ज्तंकम या व्यापर ही एक मात्र सार्वजनिक प्रमाणित दृष्य सत्य है और यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड क्षेत्र में व्याप्त है। इस कारण यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सर्वोच्च और अन्तिम व्यापार क्षेत्र या व्यापार केन्द्र ज्तंकम ब्मदजतम है।
12. कोई किसी अन्य के लिए कर्म नहीं करता। सभी अपनी षान्ति, स्थिरता, एकता व विकास के लिए कर्म करते है चाहे वह मानव हो या ईष्वर हो या अवतार हो या कोई अन्य।
13. जिसका न आदि है, न अन्त है अर्थात जो षाष्वत, हमेषा और सर्वत्र है। उस आत्म तत्व का जानना ही एक मात्र धर्म को जानना है और उस धर्म का नाम सनातन धर्म है। अवतारगण बार-बार समाज के बहुमत मन और प्रचलित भाशा की दिषा से उस आत्मतत्व की ओर योग कराने के लिए ही आते रहे हैं।
14. उस आत्मतत्व को जानने के लिए ज्ञान सूत्रों के माध्यम से वेदों में, ईष्वर नाम (ओउम्) के माध्यम से उपनिशद् में, उस आत्मतत्व के गुणों व ब्रह्माण्डीय वस्तुओं (सूर्य, चाँद, ग्रह, नक्षत्र, तत्व इत्यादि) के गुणों के साकार निरूपण (मूर्ति) के माध्यम से पुराणों में, प्रकृति (सत्व, रज, तम, आसुरी , दैवी व उसके अन्य अंष गुणों) के माध्यम से गीता/गीतोपनिशद् में व्यक्त किया गया है। इन सभी माध्यमों सहित वर्तमान पदार्थ विज्ञान, समाज विज्ञान, राजनीति विज्ञान, षासन प्रणाली इत्यादि के माध्यम से सार्वजनिक प्रमाणित गीता अर्थात विष्वषास्त्र में व्यक्त किया गया है।
15. पौराणिक साकार चरित्रों के निरूपण से ही समाज में जो पहचान बनी वह धर्म- हिन्दू धर्म कहलाया जबकि अवतारगण (सनातन समर्थक) का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं रहा और न ही वे इनकी पूजा करते हुये दर्षाये गये। अवतारगण मात्र षिव (आत्मा) और उसके प्रतीक रूप षिवलिंग तक ही सीमित रहे। क्योंकि वे जानते थे कि ये सब मात्र माध्यम हैं न कि लक्ष्य।
16. पिछले कुछ सौ वर्शो में जो दो सार्वाधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन इस मानव समाज में हुए हैं वे हैं- पदार्थ (भौतिक) विज्ञान व निराकार आधारित लोकतान्त्रिक षासन का विकास व इनके प्रभुत्व की ओर सदैव बढ़ता हुआ विकास। व्यक्ति का स्वयं को संचालन व्यश्टि मन से होता है परन्तु जब वह राजा के पद पर बैठता है तब वह व्यक्ति होते हुये भी संयुक्त मन-समश्टि मन से संचालित होता है। भगवान परषुराम ने साकार आधारित लोकतंत्र व्यवस्था दी थी जिसे परषुराम परम्परा के नाम से जानते हैं। वाल्मीकि रचित रामायण से आदर्ष मानक व्यक्ति चरित्र का प्रस्तुतीकरण व्यक्ति संचालन का आदर्ष रूप प्रस्तुत हुआ। भगवान श्रीकृश्ण ने साकार आधारित परषुराम परम्परा का नाष किया (क्योंकि उस समय राजा भी व्यश्टि मन से षासन करने लगे थे) और पूर्ववर्ती सभी मतो का समन्वय व एकीकरण करते हुये निराकार आधारित लोकतंत्र व्यवस्था के प्रारम्भ का बीज षास्त्र ”गीता/गीतोपनिशद्“ प्रस्तुत किये। उसके उपरान्त भगवान बुद्ध ने भगवान श्रीकृश्ण के क्रम को आगे बढ़ाते हुए बुद्धि, संघ व धर्म के षरण में जाने की षिक्षा दी। वर्तमान में पूर्ववर्ती सभी धर्मो व मतो का समन्वय व एकीकरण करते हुये निराकार आधारित लोकतंत्र व्यवस्था का वृक्ष षास्त्र विष्व नागरिक धर्म का धर्मयुक्त धर्मषास्त्र-कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेदीय श्रृंखला, विष्व-राज्यधर्म का धर्मनिपेक्ष धर्मषास्त्र- विष्वमानक षून्य-मन की गुणवत्ता का विष्वमानक श्रृंखला, आदर्ष मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र समाहित आदर्ष मानक वैष्विक व्यक्ति चरित्र अर्थात सार्वजनिक प्रमाणित आदर्ष मानक वैष्विक व्यक्ति चरित्र का प्रस्तुतीकरण लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ ने इस विष्वषास्त्र से किया है। आत्मतत्व की ओर जो व्यक्ति को जोड़ता है वह व्यश्टि गुरू तथा जो राज्य सहित व्यक्ति को आत्मतत्व की ओर मोड़ता व जोड़ता है वह राजगुरू या राश्ट्रगुरू कहलाता है। वर्तमान समय में राश्ट्र (राज्य) को मार्गदर्षन देने वाले षास्त्र का अभाव था जिसके लिए नये धर्मषास्त्र की आवष्यकता थी जो पूर्ण हुई। यदि आवष्यकता न रहती तो अन्तिम महावतार कल्कि की क्या आवष्यकता रहती और किस कार्य के लिए रहती? विचारणीय विशय है।
प्रत्येक बच्चे की भाँति मैं भी एक बच्चे के रूप से ही इस अवस्था तक आया हूँ। बस आप में और मुझमें यह अन्तर है कि मैं अपने बचपन से स्वयं को महान समझता था जो आप भी थे। इस महानता को मैनें कभी नहीं भूला। यह अलग बात है कि उसे सिद्ध करने में इतने वर्श लग गये परन्तु आप लोग भी महान हैं यह बात आप लोग भूल गये और न ही उसे सिद्ध करने की कोषिष की। जो धर्म की रक्षा करने के लिए स्वयं को कठिन परिस्थितियों में डालता है या कठिन परिस्थितियों में भी धर्म को नहीं भूलता ईष्वर और       धर्म उन्हीं में अवतरित होता है।
जिस प्रकार आप अपने परिवार के संरक्षण, व्यवस्था और विकास के लिए सजग रहकर कर्म करते हैं उसी प्रकार मैं भी अपने विष्व परिवार के लिए सदैव सजग रहकर प्रत्येक युग में कर्म करता रहा हूँ। आपका व्यक्गित परिवार, हमारे विष्व परिवार की इकाई है, इसलिए यह न सोचे कि यह कार्य आपके लिए नहीं हुआ है।
षास्त्र के अन्त में स्वामी विवेकानन्द जी के द्वारा लिखित पुस्तकों 1. धर्म-विज्ञान, 2. योग क्या है?, 3. ज्ञान योग, 4. राजयोग, 5. भक्ति योग, 6. प्रेम योग, 7. कर्मयोग के कुछ अंष को परिषिश्ट के रूप में इस अधिकार के साथ जोड़ा गया है जैसे उसके बिना यह षास्त्र अधूरा है। सत्य तो यह है कि मैं भी स्वामी विवेकानन्द के बिना अधूरा हूँ और पुनर्जन्म मार्ग से मैं उनकी अगली और अन्तिम कड़ी हूँ।
षास्त्र को पूर्ण करने के उपरान्त इसके गुणों के आधार पर धर्म और धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव क्षेत्र से अनेकों नाम निकलकर आये जो क्यों हैं, इसका भी स्पश्टीकरण इस षास्त्र में दिया गया है। फिर भी एक सर्वोच्च और सर्वमान्य नाम की आवष्यकता थी इसलिए इस षास्त्र का नाम ”विष्वषास्त्र“ रखा गया तथा एक संक्षिप्त वाक्य (ज्ंह स्पदम) के विचार पर पाँच वाक्य 1. ”विष्व का अन्तिम ज्ञान (ज्ीम पिदंस ादवूसमकहम व िूवतसक)“, 2. ”भारत का अन्तिम ज्ञान (ज्ीम पिदंस ादवूसमकहम व िप्दकपं)“, 3. ”ज्ञान का अन्त (ज्ीम मदक व िादवूसमकहम)“, 4. ”अन्तिम कार्य योजना का ज्ञान (ज्ीम ादवूसमकहम व िपिदंस ंबजपवद चसंद)“ और 5. ”अन्तिम ज्ञान का ज्ञान (ज्ीम ज्ञदवूसमकहम व िपिदंस ादवूसमकहम)“ सामने आये। जिसपर षैक्षिक एवं जन कल्याणकारी ट्रस्ट- ”सत्यकाषी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विष्वविद्यालय (स.ब्र.ए.वि.वि.)  ;ैंजलंांेीप न्दपअमतेंस प्दजमहतंजपवद ैबपमदबम न्दपअमतेपजल. ैन्.प्ैन्)“ के ट्रस्टी गण श्री चन्द्रेश कुमार, श्री अजय कुमार सिंह, डाॅ0 राम व्यास सिंह, डाॅ0 कन्हैया लाल, श्री प्रदीप कुमार सिंह, ई0 विनय कुमार सिंह के विचारों से संक्षिप्त वाक्य ”अन्तिम ज्ञान का ज्ञान (ज्ीम ज्ञदवूसमकहम व िपिदंस ादवूसमकहम)“ के लिए सहमति व्यक्त की गयी। इनके प्रति मैं आभारी हूँ।
हमें आषा ही नहीं पूर्ण विष्वास है कि आप भी उस मन स्तर और व्यापक हृदय पर स्थित होकर ही इस षास्त्र का अध्ययन, चितंन व मनन करेंगें जिससे आपका मस्तिश्क पूर्णता को प्राप्त हो सके। आपका मस्तिश्क पूर्णता को प्राप्त करे और इस सुन्दर संसार को और भी सुन्दर बनाने के लिए षारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से सक्रिय हो, यही सबसे बड़ा धर्म और धार्मिक कार्य होगा। अन्त में-
माँफ करना ऐ भारत, मंजिल पर आया हूँ थोड़ी देर से।
                                    मोहब्बत पड़ावो को भी थी, हक उनका अदा करना था।
-लवकुष सिंह ”विष्वमानव“

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