सोमवार, 7 मार्च 2011

सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय

सत्यकाशी  ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय  

ग्राम- बघेड़ा, पोस्ट- पुरुषोत्तमपुर , जिला- मिर्ज़ापुर 

पिन कोड- 231305

मोबाईल न. 09721581381



न्यास-पत्र ;ज्तनेज क्ममकद्ध

हिन्दी में- सत्यकाषी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विष्वविद्यालय
(षैक्षणिक एवं जन कल्याणकारी ट्रस्ट)
 अंग्रेजी में- ै।ज्ल्।ज्ञ।ैभ्प् न्छप्टम्त्ै।स् प्छज्म्ळत्।ज्प्व्छ ैब्प्म्छब्म् न्छप्टम्त्ैप्ज्ल्
;म्कनबंजपवदंस - च्नइसपब ब्ींतपजंइसम ज्तनेजद्ध

पंजीकृत एवं मुख्य कार्यालय
ग्राम-बघेड़ा, पोस्ट-पुरूशोत्तमपुर,
जिला-मीरजापुर (उ0 प्र0) भारत, पिन - 231305

प्रस्तावना एवम् भूमिकाः-
विभिन्न सम्प्रदाय (धर्म), जाति, मत, दर्षन इत्यादि में विभाजित इस मानव समाज में वर्तमान तथा आने वाले भविश्य के समय की मूल आवष्यकता है- मानव के मनो का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण। इसकी आवष्यकता इसलिए भी है क्योंकि मानव अपने विज्ञान व तकनीकी ज्ञान से प्राप्त संसाधनो का प्रयोग करते हुये, एक तरफ तो ब्रह्माण्ड की ओर चल पड़ा है तो दुसरी तरफ विध्वंस के लिए अनेक हथियारों का भी निर्माण कर चुका है। ऐसी स्थिति में हमें निष्चित रूप से ऐसे एकीकरण की आवष्यकता है जिससे हम इस पृथ्वी से मानसिक स्तर के विवादों को समाप्त कर सकें।
माया सभ्यता के अनुसार विष्व के मानव समाज यह भी मान रहें हैं कि 21 दिसम्बर, 2012 को दुनिया का अन्त हो जायेगा। जबकि हिन्दू धर्म षास्त्र विश्णु पुराण, भागवत पुराण, अग्नि पुराण, गरूड़ पुराण, पद्म पुराण इत्यादि में भगवान के दसवें और महाअवतार ”कल्कि“ का होना अभी षेश है। जिनसे कलियुग के अंधकार व विनाष को समाप्त करने का कार्य सम्पन्न होगा, साथ ही सत्ययुग का आरम्भ होगा। सिक्ख धर्म के पवित्र ग्रन्थ ”दषम् ग्रन्थ“ में भी ”कल्कि अवतार“ का वर्णन मिलता है।
सृजन और विनाष, का स्तर षारीरिक, आर्थिक व मानसिक होता है। जो एक व्यक्ति, समाज, देष और विष्व राश्ट्र के लिए होता है। व्यक्ति पर हुये षारीरिक, आर्थिक व मानसिक सृजन और विनाष को व्यक्ति ही अनुभव करता है परन्तु समाज, देष और विष्व राश्ट्र पर हुये षारीरिक, आर्थिक व मानसिक सृजन व विनाष को सार्वजनिक रूप से सभी देखते है। समाज, देष और विष्व राश्ट्र पर षारीरिक व आर्थिक सृजन और विनाष वर्तमान में तो चल ही रहा है जिसे सार्वजनिक रूप से मानव समाज देख रहा है।
भौतिकवादी पष्चिमी संस्कृति किसी भी सृजन व विनाष को मानसिक स्तर पर सोच ही नहीं सकता क्योंकि वह समस्त क्रियाकलाप को बाह्य जगत में ही घटित होता समझाता है जबकि वर्तमान समय मानसिक स्तर पर विनाष व सृजन का है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि माया सभ्यता के अनुसार 21 दिसम्बर, 2012 को जो विनाष व सृजन होगा, वह मानसिक स्तर का ही होगा। जिसके परिणामस्वरूप सभी सम्प्रदाय, मत, दर्षन एक उच्च स्तर के विचार या सत्य में विलीन अर्थात विनाष को प्राप्त करेगा। फलस्वरूप उच्च स्तर के विचार या सत्य में स्थापित होने से सृजन होगा। कुल मिलाकर माया सभ्यता के कैलेण्डर का अन्त तिथि 21 दिसम्बर, 2012, दुनिया के अन्त की तिथि नहीं बल्कि वह वर्तमान युग के अन्त की अन्तिम तिथि का अनुमान है जिसके बाद नये युग का आरम्भ होगा।
ईष्वर भी इतना मूर्ख व अज्ञानी नहीं है कि वह स्वयं को इस मानव षरीर में पूर्ण व्यक्त किये बिना ही दुनिया को नश्ट कर दे। इसके सम्बन्ध में हिन्दू धर्म षास्त्रो में सृश्टि के प्रारम्भ के सम्बन्ध में कहा गया है कि- ”ईष्वर ने इच्छा व्यक्त की कि मैं एक हूॅ, अनेक हो जाऊ“। इस प्रकार जब वही ईष्वर सभी में है तब निष्चित रूप से जब तक सभी मानव ईष्वर नहीं हो जाते तब तक दुनिया के अन्त होने का कोई प्रष्न ही नहीं उठता। और विकास क्रम चलता रहेगा।
21 दिसम्बर, 2012 के बाद का समय नये युग के प्रारम्भ का समय है जिसमें ज्ञान, ध्यान, चेतना, भाव, जन, देष, विष्व राश्ट्र, आध्यात्मिक जागरण, मानवता इत्यादि का विष्वव्यापी विकास होगा। परिणामस्वरूप सभी मानव को ईष्वर रूप में स्थापित होने का अवसर प्राप्त होगा। और यही विष्व मानव समाज की मूल आवष्यकता है। प्राचीन वैदिक काल में समाज को नियंत्रित करने के लिए ज्ञानार्जन सबके लिए खुला नहीं था परन्तु वर्तमान और भविश्य की आवष्यकता यह है कि समाज को नियंत्रित करने के लिए सभी को पूर्ण ज्ञान से युक्त कर सभी के लिए ज्ञान को खोल दिया जाय। यही कारण था कि वेद को प्रतीकात्मक रूप में लिख कर गुरू-षिश्य परम्परा द्वारा उसकी व्याख्या की जाती रही थी जिससे राजा और समाज को नियंत्रण में रखा जा सके।
सभी मानव को ईष्वर रूप में स्थापित होने के लिए जो माध्यम चाहिए वह है- ”एकात्म विज्ञान“ व ”ईष्वर षास्त्र“ विशय से मानव को षिक्षित करना। इस आवष्यकता हेतू ही इस ट्रस्ट का गठन किया जा रहा है जिससे इस विशय पर षैक्षणिक पाठ्यक्रम के लिए पाठ्य पुस्तको का सृजन किया जा सके। और षिक्षा पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से अध्ययन के लिए षामिल कराया जा सके। इस हेतू हम सब भारतीय नागरिक ट्रस्टीगण भारतीय संविधान के धारा-51(ए) के अन्तर्गत नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य के अनुसार कार्य करने का कत्र्तव्य पूर्ण करने के लिए वचनबद्ध होते है जो निम्नलिखित है-
1. स्ंाविधान के प्रति प्रतिबद्धता, इसके आदर्षो, धाराओं, राश्ट्रीय ध्वज व राश्ट्रीय गान का   आदर करना।
2. स्वतंत्रता के लिए संघर्श हेतू प्रेरित करने वाले सुआदर्षाे का अनुकरण करना व उन्हें चिरस्थायी बनाना।
3. भारत की सर्वोच्चता, एकता और अखण्डता की रक्षा करना तथा समर्थन करना।
4. जब भी आवष्यकता पड़े देष की रक्षा करना व राश्ट्रीय सेवाओं हेतू समर्पित होना।
5. स्माज में भाई-चारें की भावना का विस्तार करना, मातृत्व भाव, धार्मिक, भाशायिक, क्षेत्रीय विभिन्नताओं में एकता कायम करना तथा नारी सम्मान आदि का ध्यान देना।
6. अपने मिश्रित संस्कृति का मुल्यांकन करना उसको स्थायित्व देना और इसकी परम्परा को कायम रखना।
7. प्राकृतिक सम्पदा की रक्षा करना जिसमें जलवायु, जंगल, झील, नदियां, जंगली जीवों व समस्त जीवों के प्रति दया का भाव सम्मिलित है।
8. वैज्ञानिक भावना को प्रोत्साहित करना, मानवीय भावनाओं के स्वरूप की परख करते रहना।
9. जन सम्पत्ति की सुरक्षा करना और हिंसा आदि का परित्याग करना।
10. व्यक्तिगत, सामूहिक गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोच्चता हासिल करना, जिससे राश्ट्र षतत उत्थान, प्रयत्न व प्राप्ति की ओर अग्रसर होता रहे।
11. जो कि माता-पिता या अभिभावक हो, वे अपने 6 साल से 14 साल के बच्चों को षिक्षा या अन्य ऐसे सुअवसरों का लाभ उन्हें मुहैया करावें।

उपरोक्त हेतु मैं चन्द्रेष कुमार  (मुख्य प्रबन्ध ट्रस्टी) पुत्र श्री झुल्लन प्रसाद, निवासी ग्राम- रामजीपुर, पो0-पुरुशोत्तमपुर, थाना-अदलहाट, तहसील-चुनार, जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305 द्वारा उपरोक्त ट्रस्ट की स्थापना करके ट्रस्ट फण्ड के रुप में रु0 5000/- की राषि प्रदान करके उपरोक्त ट्रस्ट की स्थापना अग्रलिखित संविधान एवं नियमावली के अन्तर्गत की जा रही है।

1. ट्रस्ट का नाम, मुख्य एवं षाखा कार्यालय:-
इस ट्रस्ट का नाम हिन्दी में- ”सत्यकाषी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विष्वविद्यालय“ (अंग्रेजी में- ै।ज्ल्ज्ञ।ैभ्प् न्छप्टम्त्ै।स् प्छज्म्ळत्।ज्प्व्छ ैब्प्म्छब्म् न्छप्टम्त्ैप्ज्ल्द्ध रखा जा रहा है जो एक षैक्षिक एवं जन कल्याणकारी (म्कनबंजपवदंस - च्नइसपब ब्ींतपजंइसम) ट्रस्ट है। जिसका पंजीकृत एवं मुख्य कार्यालय ग्राम- बधेड़ा, पो0-पुरुशोत्तमपुर, थाना-अदलहाट, तहसील-चुनार, जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305 में रहेगा । ट्रस्ट का मुख्य एवं षाखा कार्यालय आवष्यकतानुसार ट्रस्टी द्वारा पारित प्रस्ताव के जरिये बदला एवं प्रारम्भ भी किया जा सकेगा ।

2. ट्रस्ट का  स्थापना दिवस:-
ट्रस्ट का स्थापना दिवस- विष्व षिक्षक दिवस - 5 अक्टुबर को माना जायेगा ।

3. ट्रस्ट का मूल विचार, आधार षास्त्र-साहित्य और साखः-
ट्रस्ट का मूल विचार ”मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण  एवं ब्रह्माण्डीयकरण“ है। जो ”विष्व-भारत“ षास्त्र-साहित्य पर आधारित है वही ट्रस्ट का मूल विचार है। जिसे प्राप्त करने के लिए एकात्म, पूर्ण ज्ञान, चेतना, दृष्य योग, दृष्य ध्यान पर षोध, षिक्षण, प्रषिक्षण, वृतचित्र, चलचित्र इत्यादि माध्यम है।
श्री लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ द्वारा आविश्कृत एकीकृत सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त तथा उस पर आधारित ”विष्व-भारत“ षास्त्र-साहित्य जिसमें निम्नलिखित गुण व विशय समाहित है, ट्रस्ट का आधार षास्त्र-साहित्य है।
01.कर्मवेद, 02.षब्दवेद, 03.सत्यवेद, 04.सूक्ष्मवेद, 05.दृष्यवेद, 06.पूर्णवेद,   07.अघोरवेद, 08.विष्ववेद, 09.ऋृशिवेद, 10.मूलवेद, 11.षिववेद, 12.आत्मवेद, 13.अन्तवेद, 14.जनवेद, 15.स्ववेद, 16.लोकवेद, 17.कल्किवेद, 18.धर्मवेद, 19.व्यासवेद, 20.सार्वभौमवेद, 21.ईषवेद, 22.ध्यानवेद, 23.प्रेमवेद, 24.योगवेद, 25.स्वरवेद, 26.वाणीवेद, 27.ज्ञानवेद, 28.युगवेद, 29.स्वर्णयुगवेद, 30.समर्पणवेद, 31.उपासनावेद, सभी प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेद 32.विष्व-उपासना, 33.विष्व-योग, 34.विष्व-पुराण, 35.विष्व-मानक,            36.विष्व-धर्म-सर्वधर्म समाहित, 37.विष्व-राश्ट्र-जन एजेण्डा, 38.विष्व-कला-कृश्ण-कला समाहित, 39.विष्व-ध्यान, 40.विष्व-समर्पण, 41.विष्व-लीला, 42.विष्व-आत्मा,        43.विष्व-समन्वयाचार्य, 44.विष्व-दर्पण, 45.विष्व-मन, 46.विष्व-षिक्षा, 47.विष्व-रूप,  48.विष्व-मानव-विष्व-मन से युक्त, 49.विष्व-बुद्धि, 50.विष्व-चेतना, 51.विष्व-गुरू,    52.विष्व-प्रकाष, 53.विष्व-दृश्टि, 54.विष्व-मार्ग, 55.विष्व-राजनीति, 56.दिव्य-दृश्टि,   57.दिव्य-रूप, 58.दृष्य-योग, 59.दृष्य-ध्यान, 60.सत्य-भारत, 61.सत्य-उपासना,      62.सत्य-योग, 63.सत्य-ध्यान, 64.सत्य-पुराण, 65.सत्य-मानक, 66.सत्य-धर्म,       67.सत्य-राश्ट्र-जन एजेण्डा, 68.सत्य-कला - कृश्ण-कला समाहित, 69.सत्य-ध्यान,     70.सत्य-समर्पण, 71.सत्य-लीला, 72.सत्य-आत्मा, 73.सत्य-समन्वयाचार्य, 74.सत्य-दर्पण, 75.सत्य-मन, 76.सत्य-षिक्षा, 77.सत्य-रूप, 78.सत्य-मानव: सत्य-मन से युक्त,     79.सत्य-बुद्धि, 80.सत्य-चेतना, 81.सत्य-गुरू, 82.सत्य-प्रकाष, 83.सत्य-दृश्टि,       84.सत्य-मार्ग, 85.सत्य-राजनीति, 86.सत्य-षिव-सुन्दर, 87.यथार्थ-प्रकाष, 88.ईष्वर,   89.पुनर्जन्म, 90.ईष्वर का संक्षिप्त इतिहास, 91.ईष्वर का मष्तिश्क, 92.ईष्वर-षास्त्र,   93.मष्तिश्क परावर्तक (ब्रेन टर्मिनेटर), 94. पूर्ण प्रेरक अन्तिम कल्कि अवतार, 95.अन्तिम मार्ग, 96.अन्तिम बुद्धि, 97.भोगेष्वर-योगेष्वर समाहित, 98.पूर्णदृष्य-मैं, 99.बहुरूप में एक, 100.धर्मनिरपेक्ष धर्म षास्त्र, 101.लोकतंत्र धर्म षास्त्र, 102.लोक/जन/स्व तंत्र,        103.लोक-षास्त्र, 104.जन-षास्त्र, 105.स्व-षास्त्र, 106.कर्मोपनिशद्-अन्तिम उपनिशद्,  107.एकात्मकर्मवाद, 108.एकात्म विज्ञान, 109.कर्म वेदान्त, 110.पूर्ण ज्ञान, 111.कर्म ज्ञान, 112.जय ज्ञान-जय कर्म ज्ञान, 113.विकास-दर्षन, 114.विनाष-दर्षन, 115.सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त, 116.मानक एवं मन का विष्व मानक और पूर्ण वैष्विक मानव निर्माण की तकनीकी, 117.सार्वभौम दर्पण- व्यक्ति से ब्रह्माण्ड तक, 118.सम्पूर्ण क्रान्ति- प्रथम, अन्तिम और सर्वोच्च क्रान्ति, 119.सत्यकाषी-पंचम, सप्तम और अन्तिम काषी, 120.ज्ञान बम,    121.आध्यात्मिक न्यूट्रान बम, 122.पषुपास्त्र-ब्रह्मास्त्र व नारायणास्त्र समाहित,          123.सोषल इंजिनीयरींग, 124.सन् 2012-पाॅचवें और अन्तिम स्वर्ण युग का आरम्भ वर्श, 125.आध्यात्मिक ब्लैक होल, 126.सृश्टि-स्थिति-प्रलय ।
वर्तमान तथा भविश्य के लिए विष्व की इसकी उपयोगिता और आवष्यकता ही ट्रस्ट का साख  तथा षोध के उपरान्त प्रकाषित अन्य आधारित षास्त्र-साहित्य, षैक्षणिक पाठ्यक्रम के लिए पाठ्य पुस्तक का बाजार महत्व है।

4. ट्रस्ट की स्पश्ट निति:- ट्रस्ट की स्पश्ट निति निम्नवत् है।
ट्रस्ट भारत सहित विष्व के लिए ”जय-जवान, जय-किसान, जय-विज्ञान“ के बाद उसके पूर्णरुप ”जय-जवान, जय-किसान, जय-विज्ञान, जय-ज्ञान, जय-कर्मज्ञान“ में से ”जय-ज्ञान, जय-कर्मज्ञान“ पर आधारित है।
ट्रस्ट ”ईष्वर“ को सर्वषक्तिमान, निराकार, र्निविवाद, अदृष्य स्वीकार करते हुये भी उसके होने और न होने पर कोई बहस नहीं करना चाहता । ट्रस्ट ”ईष्वर“ को निराकार रुप में “एकीकृत सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ का रुप मानता है जिसके सामने सभी का समर्पण हमेषा से होता आया है। समय-समय पर कालानुसार इसी निराकार ”एकीकृत सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“  को प्रत्यक्ष या प्रेरक, अंष या पूर्ण रुप से स्थापित करने वाले मानव षरीर को ट्रस्ट “साकार ईष्वर“ या ”अवतार“ मानता है। ट्रस्ट इसी निराकार ”एकीकृत सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त“ को ईष्वर का मस्तिश्क मानता है और इसी की उपयोगिता को आवष्यक समझता है न कि ईष्वर को। क्योकि मानव यदि ईष्वर के मस्तिश्क को अपना ले तो वह अपने इश्ट तक असानी से उठ सकता है जो मानव जीवन का लक्ष्य है।
ट्रस्ट का मूल प्रकृति के दृष्य, एक, अपरिवर्तनीय, सार्वजनिक प्रमाणित, विवादमुक्त नियम आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है। ट्रस्ट का सम्पूर्ण ज्ञान व कार्य इसी मुक्त आदान-प्रदान की षिक्षा पर आधारित है। मनुश्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए उत्पन्न है न कि उसके अधीन होने के लिए इसलिए ट्रस्ट की षिक्षा आदान-प्रदान को मनुश्य के अधीन करने की षिक्षा है जिसे सत्य चेतना कहते है और जो सभी मनुश्य की आवष्यकता है जिससे प्रत्येक मनुश्य स्वयं को अपने-अपने इश्ट तक उठा सकें।
ट्रस्ट किसी सम्प्रदाय का संस्थापक नहीं है न ही उसके पास किसी विषेश वस्त्र का प्रचलन, किसी विषेश मूर्ति की पूजा, गुरु-षिश्य परम्परा, गुरु दक्षिणा, गुरु मंत्र, जीवन षैली का प्रविधान है न ही उसका संचालन इसका उद्देष्य है। ट्रस्ट ज्ञान-कर्मज्ञान-दृष्य कर्मज्ञान के प्रसार एवं उसे प्रमाणित करने के लिए कर्म करने का संस्था मात्र है जिससे मानव, मानव से जुड़कर स्वयं अपने सहित जहाँ भी वह रहे, वहाँ स्वतः स्फूर्त सत्य-चेतना से संतुलित कार्य कर सके जो ब्रह्माण्डीय विकास की दिषा में हो।
कर्म, अदृष्य ज्ञान का दृष्य रुप है। अर्थात् दृष्य क्रिया या व्यापार या आदान-प्रदान या परिवर्तन या अनेक या चक्र या ज्त्।क्म् या प्राकृतिक सत्य का अदृष्य रुप आत्मा या ब्म्छज्त्म् या केन्द्र या सत्य या धर्म या ईष्वर या ब्रह्म है। पिछले चारो वेदों के ज्ञान काण्ड अर्थात् उपनिशद से ज्ञान अपने चरम विकास को प्राप्त कर चुका है जिसे वेदान्त कहते हैं। अब ज्ञान के दृष्य रुप अर्थात् कर्म-ज्ञान का क्रम विकास चल रहा है। जिसे प्रथमतया भगवान कृश्ण ने फल की इच्छा से मुक्त होकर कर्म करने की षिक्षा देकर की। और अब उसका पूर्णरुप फल को जानकर कर्म करने की षिक्षा है। जो अदृष्य पूर्णज्ञान का दृष्य पूर्ण कर्म के रुप में परिवर्तन है। जो देष-काल मुक्त ज्ञान ब्रह्माण्डीय सीमा तक सत्य है वहीं वेद है और जो देष-काल मुक्त कर्मज्ञान ब्रह्माण्डीय सीमा तक प्रभावी है वहीं कर्मवेद है।
ट्रस्ट अपने साहित्य एवं विचार को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में लाये गये षब्द या नाम जिन्हें वर्तमान समाज में व्यक्ति किसी सम्प्रदाय विषेश का समझते हैं, किसी भी परिस्थितियों में उन षब्दों का प्रयोग कर किसी भी मानव अविश्कृत सम्प्रदाय को सर्वोच्च प्राथमिकता देना ट्रस्ट की निति नहीं है। उन षब्दों या नामों का प्रयोग ट्रस्ट मात्र अपने विचार को व्यक्त करने के लिए करता है। यदि कोई यह सोचे कि ट्रस्ट किसी विषेश सम्प्रदाय का समर्थक है तो वह उसका स्वयं का विचार होगा जो उसके मन द्वारा ही भ्रमवष या अल्पज्ञता के कारण उत्पन्न हुआ होगा। ट्रस्ट केवल प्रकृति अविश्कृत सम्प्रदाय मानव एवं प्रकृति सम्प्रदाय का समर्थक है।
जिस प्रकार उन षब्दों का प्रयोग जिन्हें वर्तमान समय में साम्प्रदायिक समझा जाता हैं, स्वयं को व्यक्त करने के लिए उनका प्रयोग हमारी मजबूरी है। उसी प्रकार यह भी हमारी मजबूरी है कि हम ऐसे विशय को किसी ऐसे विशय से नहीं जोड़ सकते जो अव्यक्त हो, अदृष्य हो और जो अन्धभक्ति उत्पन्न करे और जिसे हम सार्वजनिक प्रमाणित न कर सकें। क्योकिं किसी भी व्यक्ति का व्यक्त रुप उसके ज्ञान व कर्मज्ञान के व्यक्त करने के उपरान्त ही स्थापित होता है। ट्रस्ट का सम्पूर्ण क्रियाकलाप एक ही भौतिक षरीर जिसका नाम ”लवकुष सिंह“ हैं, के द्वारा व्यक्त हो रहा है और इस नाम का प्रयोग भी हमारी मजबूरी है।
व्यक्ति से व्यक्ति के बीच सम्बन्ध में एक न्यूनतम एवं अधिकतम् साझा कार्यक्रम है, पुनः एक संगठन का उस संगठन से जुड़े सभी व्यकितयों का एक न्यूनतम् एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम है। इसी प्रकार संगठन से संगठन एवं देष से देष के बीच एक न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम होगा। यह यदि मानव के लिए होगा तो मानव व्यवस्था का तथा मानव सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कार्यक्रम होगा तो वह क्रियाकलापों का विष्वमानक कहा जायेगा और उस ज्ञान से युक्त मन, मन का विष्वमानक कहा जायेगा और इस मन से युक्त मानव, विष्वमानव। यहीं विष्वमानक षून्य श्रृंखला अर्थात् मन का विष्वमानक है। यहीं एकता या धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव रुप में विष्वमानक - षून्य श्रृंखला की उत्पत्ति की दिषा है।
ट्रस्ट व्यक्ति के जीवन षैली पर नहीं बल्कि व्यक्ति द्वारा आविश्कृत / उत्पादित, उत्पाद पर ध्यान देता है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार एक वैज्ञानिक द्वारा आविश्कृत उत्पाद का लाभ सभी प्राप्त करते है जवकि वैज्ञानिक के जीवन षैली को कोई नहीं अपनाता। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मवेद या मन का विष्व मानक के आविश्कार का लाभ समाज व राश्ट्र उठाये, न कि आविश्कारक के जीवन षैली को जानने की कोषिष करें क्योकि कोई भी आविश्कारक, आविश्कार एवं उसकी स्थापना के लिए स्वयं को अनेक विचित्र परिस्थितियो से गुजारता है। और आविश्कार पूर्ण हो जाने पर प्रयोग के परिस्थितियो से गुजरने की आवष्यकता नहीं रह जाती।

5. ट्रस्ट के नाम की उत्पत्ति एवं अर्थ:-
ट्रस्ट के नाम की उत्पत्ति का मूल विचार एकीकरण ही है। सत्यकाषी, सात काषीयों का एकीकरण है। ब्रह्माण्ड, स्वयं अपने आप में सर्वोच्च एकीकृत कर्मक्षेत्र है जो कर्म हेतू सभी के लिए खुला है। इस प्रकार ब्रह्माण्डीय, का अर्थ ब्रह्माण्ड स्तर है। एकात्म का अर्थ- उस एक से है जो सभी में विद्यमान है। विज्ञान का अर्थ- उस प्रक्रिया के ज्ञान से है जिसके लिए कर्म करना है। विष्वविद्यालय का अर्थ- विष्व स्तर के विद्यालय से है। इस प्रकार सम्पूर्ण अर्थ सत्यकाषी स्थित ब्रह्माण्डीय स्तर पर सभी को एक करने की प्रक्रिया का विष्वस्तरीय विद्यालय है।

6. ट्रस्ट का प्रतीक चिन्ह:-

7. ट्रस्ट के प्रतीक चिन्ह का अर्थ:-
ट्रस्ट के प्रतीक चिन्ह का अर्थ ”दर्षन षास्त्र“ तथा ”पदार्थ / भौतिक विज्ञान“ के सर्वोच्च और अन्तिम सिद्धान्त में एकीकरण तथा ईष्वर के मस्तिश्क को व्यक्त करता है।
भौतिक विज्ञान के अनुसार - भौतिक विज्ञान के नवीनतम आविश्कार के आविश्कारक महान वैज्ञानिक एवम् ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक ब्रिटिष स्टीफेन विलियम हाकिंग (जिन्हें दूसरा आईन्सटाइन कहा जाता है) के अनुसार- ‘‘ब्लैक होल (सर्वोच्च गुरूत्वाकर्शण की ब्रह्माण्डीय अति सघन वस्तु) के पी-ब्रेन्स माॅडल में पी-ब्रेन स्थान के तीन आयामों और अन्य सात आयामों में चलती है जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं चलता। यदि हम सभी बलों के एकीकरण का एक सार्वभौम समीकरण विकसित करें तो हम ईष्वर के मष्तिश्क को जान जायेगें क्योंकि हम भविश्य के कार्य का निर्धारण कर सकेगें, और यह मनुश्य के मस्तिश्क के द्वारा सर्वोच्च अविश्कार होगी। (प्रो0 स्टीफेन हाकिंग के भारत यात्रा पर राश्ट्रीय सहारा समाचार पत्र के 27 जनवरी ‘2001 को प्रकाषित ‘हस्तक्षेप’ अंक से)’। भौतिक विज्ञान के वर्तमान ब्रह्माण्ड व्याख्या के अनुसार ब्लैक होल एक तन्त्र या ब्रह्माण्ड के अन्त का प्रतीक है अर्थात् वह एक तन्त्र या ब्रह्माण्ड के प्रारम्भ का भी प्रतीक होगा। इस प्रकार बाह्य अनुभूति से हम पाते है कि एक सिंगुलारिटी (एकलता) है तथा तीन और सात आयाम है।
दर्षन षास्त्र के व्यक्तिगत प्रमाणित मार्गदर्षक दर्षन के अनुसार - दर्षन षास्त्र से व्यक्त भारत के सर्वप्राचीन दर्षनों (बल्कि विष्व के) में से एक और वर्तमान तक अभेद्य सांख्य दर्षन में ब्रह्माण्ड विज्ञान की विस्तृत व्याख्या उपलब्ध है। स्वामी विवेकानन्द जी के व्याख्या के अनुसार- ‘‘प्रथमतः अव्यक्त प्रकृति (अर्थात तीन आयाम- सत, रज, और तम), यह सर्वव्यापी बुद्धितत्व (1. महत्) में परिणत होती है, यह फिर सर्वव्यापी अंहतत्व (2. अहंकार) में और यह परिणाम प्राप्त करके फिर सर्वव्यापी इंद्रियग्राह्य भूत (3. तन्मात्रा- सूक्ष्मभूतः गंध, स्वाद, स्पर्ष, दृश्टि, ध्वनि 4. इन्द्रिय ज्ञानः श्रोत, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, घ्राण) में परिणत होता है। यही भूत समश्टि इन्द्रिय अथवा केन्द्र समूह (5. मन) और समश्टि सूक्ष्म परमाणु समूह (6. इन्द्रिय-कर्मः वाक, हस्त, पाद, उपस्थ, गुदा) में परिणत होता है। फिर इन सबके मिलने से इस स्थूल जगत प्रपंच (7. स्थूल भूतः आकाष, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) की उत्पत्ति होती है। सांख्य मत के अनुसार यही सृश्टि का क्रम है और बृहत् ब्रह्माण्ड में जो है-वह व्यश्टि अथवा क्षूद्र ब्रह्माण्ड में भी अवष्य रहेगा। जब साम्यावस्था भंग होती है, तब ये विभिन्न षक्ति समूह विभिन्न रूपों में सम्मिलित होने लगते है और तभी यह ब्रह्माण्ड बहिर्गत होता है। और समय आता है जब वस्तुओं का उसी आदिम साम्यावस्था में फिर से लौटने का उपक्रम चलता है। (अर्थात एक तन्त्र का अन्त) और ऐसा भी समय आता है कि सब जो कुछ भावापन्न है, उस सब का सम्पूर्ण अभाव हो जाता है। (अर्थात सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अन्त)। फिर कुछ समय पष्चात् यह अवस्था नश्ट हो जाती है तथा षक्तियों के बाहर की ओर प्रसारित होने का उपक्रम आरम्भ होता है। तथा ब्रह्माण्ड धीरे-धीरे तंरगाकार में बहिर्गत होता है। जगत् की सब गति तरंग के आकार में ही होता है- एक बार उत्थान, फिर पतन। प्रलय और सृश्टि अथवा क्रम संकोच और क्रम विकास (अर्थात एक तन्त्र या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अन्त और आरम्भ) अनन्त काल से चल रहे है।ं अतएव हम जब आदि अथवा आरम्भ की बात करते है तब हम एक कल्प (अर्थात चक्र) आरम्भ की ओर ही लक्ष्य रखते है।’’
उपरोक्त दोनो में एकीकरण करते हुये दर्षन षास्त्र के सार्वजनिक प्रमाणित विकास / विनाष दर्षन के अनुसार - सृश्टि में, सृश्टि का कारण मानक अर्थात आत्मा अर्थात ब्लैक होल से सत्व गुण युक्त मार्गदर्षक दर्षन ;ळनपकमत च्ीपसवेवचीलद्ध से प्रारम्भ होकर स्थिति में रज गुण युक्त क्रियान्वयन दर्षन ;व्चमतंजपदह च्ीपसवेवचीलद्ध से होते हुये प्रलय में तम गुण युक्त विकास / विनाष दर्षन ;क्मेजतवलमत ध् क्मअमसवचउमदज च्ीपसवेवचीलद्ध को व्यक्त करता है। जिससे आदान-प्रदान ;ज्तंदेंबजपवदद्ध, ग्रामीण ;त्नतंसद्ध, आधुनिकता / अनुकलनता ;।कअंदबमउमदज ध् ।कंचजंइपसपजलद्ध, विकास ;क्मअमसवचउमदजद्ध, षिक्षा ;म्कनबंजपवदद्ध, प्राकृतिक सत्य ;छंजनतंस ज्तनजीद्ध  व धर्म ;त्मसपहपवदद्ध  या एकत्व या केन्द्र व्यक्त होता है। ट्रस्ट के प्रतीक चिन्ह में यही दर्षाया गया है। साथ ही ट्रस्ट के अंग्रेजी नाम का संक्षिप्त नाम ैन्प्ैन् प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा है और उपर संक्षिप्त नाम का उच्चारण ल्म्ै ल्व्न् प् ल्म्ै ल्व्न् लिखा है। जिसका हिन्दी अर्थ ”हाॅ तुम मैं हाॅ तुम“ है। अर्थात तुम तभी हो जब मैं तुम्हारे साथ है। इस मैं का सार्वभौम रूप ही मनुश्य का सत्य रूप है।
कोई भी विकास दर्षन अपने अन्दर पुराने सभी दर्षनों को समाहित कर लेता है अर्थात उसका विनाष कर देता है और स्वयं मार्गदर्षक दर्षन का स्थान ले लेता है। अर्थात सृश्टि-स्थिति-प्रलय फिर सृश्टि। चक्रीय रूप में ऐसा सोचने वाला ही नये परिभाशा में आस्तिक और सिर्फ सीधी रेखा में सृश्टि-स्थिति-प्रलय सोचने वाला नास्तिक कहलाता है।



8. ट्रस्ट का गठन:-
संस्थापक ट्रस्टी द्वारा गठित उपरोक्त ट्रस्ट में निम्नांकित ट्रस्टीगण उनकी स्वीकृति के उपरान्त नियुक्त किये गये हैं जो परोपकार और समाज सेवा की भावना से प्रेरित होकर स्वेच्छा से उक्त ट्रस्ट के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका एवं सहभागिता दर्ज कर रहे हैं और नामित ट्रस्टीगण ट्रस्ट की प्रस्तावना में प्रदर्षित उद्देष्यों की पूर्ति हेतू पूर्णतः समर्पित व वचनबद्ध है।

ट्रस्टीयों के नाम, पिता का नाम व पता पद

1. श्री लवकुष सिंह  पुत्र श्री धीरज नारायण सिंह               (संरक्षक ट्रस्टी)
ग्राम-नियामतपुर कलाँ, पो0-पुरुशोत्तमपुर,
जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305

2. श्री चन्द्रेष कुमार पुत्र श्री झुल्लन प्रसाद                     (मुख्य प्रबन्ध ट्रस्टी)
ग्राम-रामजीपुर, पो0-पुरुशोत्तमपुर,
जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305

3. श्री अजय कुमार सिंह पुत्र श्री मौनीराम ंिसंह     ट्रस्टी
 ग्राम-बघेड़ा, पो0-पुरुशोत्तमपुर,
जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305

4. श्री राम व्यास सिंह पुत्र श्री लक्ष्मण सिंह                    ट्रस्टी
ग्राम-कोलना , पो0-कोलना,
जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231304

5. श्री कन्हैया लाल पुत्र श्री पंचम राम     ट्रस्टी
ग्राम-घासीपुर बसाढ़ी, पो0 - अधवार
जिला-मीरजापुर (उ0 प्र0) भारत पिन - 231304  

6. श्री प्रदीप कुमार सिंह पुत्र श्री अमरनाथ ंिसंह         ट्रस्टी
ग्राम-जलालपुर माॅफी, पो0 - जलालपुर माॅफी
जिला-मीरजापुर (उ0 प्र0) भारत पिन - 231304

7. श्री विनय कुमार सिंह पुत्र श्री मौनीराम ंिसंह          ट्रस्टी
 ग्राम-बघेड़ा, पो0-पुरुशोत्तमपुर,
 जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305

इस ट्रस्ट में न्यूनतम 2 व अधिकतम 13 ट्रस्टी होगें । वर्तमान में आरम्भिक ट्रस्टीयों की संख्या उपरोक्तानुसार रहेगी जिसमें सुविधानुसार और भी ट्रस्टी पारित प्रस्ताव के जरिये बढ़ाये जा सकेंगे । उपरोक्त ट्रस्ट मण्डल का कार्यकाल 5 वर्श का होगा । ट्रस्ट मण्डल के कार्यकाल की समाप्ति के एक माह पूर्व ही नये ट्रस्ट मण्डल के पुर्नगठन की प्रक्रिया पूरी कर ली जायेगी ताकि पुराने ट्रस्ट के कार्यकाल की समाप्ति के तिथि से ही नये ट्रस्ट मण्डल का कार्य प्रारम्भ हो सके । ट्रस्ट पुर्नगठन में समाज के अन्य कर्मठ उत्साही परिजनों को अधिकतम स्थान प्राप्त हो इस बात का विषेश ध्यान रखा जायेगा। ट्रस्ट मण्डल का कार्यकाल पूर्ण होने के पूर्व ही किसी ट्रस्टी के देहावसान होने, त्याग-पत्र देने या अन्य किसी कारणवष हटाये जाने पर उस रिक्त स्थान को अविलम्ब षेश ट्रस्टी मिल-जुलकर पूर्ण कर लेंगे। ट्रस्ट मण्डल में रिक्त स्थान न रहे इस बात का विषेश ध्यान रखा जायेगा। ट्रस्टीगण परस्पर विवाद उत्पन्न नहीं करेंगें, विपरित आचरण करने वाले ट्रस्टी को षेश ट्रस्टी ऐसे ट्रस्टी के स्थान पर दूसरे सुयोग्य ट्रस्टी को नियुक्त कर सकेंगे। नये ट्रस्टीयों के नियुक्ति के समय उनकी प्रतिभा, सम्पन्नता के साथ-साथ उनकी नम्रता सेवा भावना, मिषनरी निश्ठा एवं षुद्ध आचरण पर विषेश ध्यान दिया जायेगा।
ट्रस्टीगण समय-समय पर पारस्परिक सहयोग से अपनी गतिविधियों एवं कार्य व्यवस्थाओं का निर्धारण करते रहेंगें और समय-समय पर समाज के उन्नयन और विकास हेतू वैष्विक, राश्ट्रीय एवं प्रादेषिक सेवा संगठनों से परामर्ष एवं मागदर्षन प्राप्त करते रहेंगे।
ट्रस्ट के उद्देष्यों की पूर्ति एवं कार्यक्रमों के समुचित क्रियान्वयन हेतू समय-समय पर बनायी जाने वाली कार्य योजना एवं कार्यक्रम की रुपरेखा पर ट्रस्टीयों की आम सहमति लेना आवष्यक है। ट्रस्टीगण समाज के साथ आत्मीय एवं भावनात्मक सम्बन्ध बनाये रखेंगे एवं उनके मध्य विष्वास को कायम रखेंगे, महत्वपूर्ण सुझावों एवं सलाह को ट्रस्ट मिटिंग में विचारार्थ प्रस्तुत करेंगे और ऐसे सुझावों को ट्रस्ट के उद्देष्यों की पूर्ति हेतू लागू करेंगे। ट्रस्टीयों ने अपनी स्वेच्छा से इस ट्रस्ट का ट्रस्टी बनना स्वीकार किया, अतः ट्रस्टीगण ट्रस्ट के उद्देष्यों एवं कार्यक्रमों के सम्पादन एवं क्रियान्वयन हेतू पूर्णरुप से जबाबदेह होंगे।
                   
9. ट्रस्ट के उद्देष्य एवं कार्यक्रम:-
(01) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित ”एकात्म विज्ञान ;प्दजमहतंजपवद ैबपमदबमद्ध“ व ”ईष्वर षास्त्र ;ळवकपबेद्ध“ विशय के लिए विद्यालयों के विद्यार्थीयों के योग्य पाठ्य पुस्तक तैयार करना तथा षिक्षा पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से षामिल कराने हेतू प्रयत्न करना।
(02) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी डब्ल्यू.सी.एम-टी.एल.एम-ष्याम डाॅट सी ;ॅब्ड.ज्स्ड.ैभ्ल्।डण्ब्द्ध के षिक्षा द्वारा विष्व स्तरीय मानव संसाधन का निर्माण करना तथा अध्यापकों को प्रषिक्षित करना और उन्हें जन समुहों, औद्योगिक संस्थानों, गुणवत्ता संस्थानों, प्रबन्ध संस्थानों, षिक्षा संस्थानों इत्यादि तक इसकी षिक्षा पहुॅचाने के योग्य बनाना।
(03) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित विस्तारित एवं आविश्कृत विचार एवम् साहित्य, विशय एवम् विषेशज्ञ, ब्रह्माण्ड (अदृष्य एवम् दृष्य) के प्रबन्धक और क्रियाकलाप, मानव (अदृष्य एवम् दृष्य) के प्रबन्धक और क्रियाकलाप तथा उपासना स्थल का विष्वमानक द्वारा भारत सहित विष्व में वैज्ञानिक दृश्टिकोण, मानवतावाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना।
(04) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित भारत के संविधान तथा संयुक्त राश्ट्र संध के चार्टर अर्थात संविधान को सत्य स्वरूप में स्थापित करने तथा भारत गणराज्य तथा संयुक्तराश्ट्र संध के पुनर्गठन के लिए मार्गदर्षन देना साथ ही मन की गुणवत्ता के विष्वमानक की स्थापना के लिए उनके सम्बन्धित संगठनों / संस्थाओं को प्रेरित करना।
(05) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित संविधान की महत्ता, आवष्यकता, उपयोगिता तथा स्वतंत्रता, संस्कृति सामाजिक, आचार संहिता, एकता, रक्षा, अखण्डता, प्राकृतिक, पर्यावरण, स्वास्थ्य, राश्ट्रीयता, आर्थिक, मानक, मानदेय इत्यादि के प्रति जागरूक करना, नागरिकोें को सविंधान में लिखित मूल कत्र्तव्य को परिभाशित करना एवं उसके प्रति जागृत करना तथा अन्तर्राश्ट्रीय सहयोग को विकसित करना।
(06) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित सर्वेभवन्तु-सुखिनः, बसुधैव-कुदुम्बकम्, बहुजन हिताय - बहुजन सुखाय, विष्व-बन्धुत्च, एकात्ममानवतावाद, धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्मसममाव, एकात्मकर्मवाद, संपूर्ण एकता, स्वराज, सुराज, नीतिक, नैतिक व दार्षनिक परम्परा का पुनस्र्थापना करना और उन्हें नवीन तथा अन्तिम रुप से परिभाशित करना।
(07) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित दार्षनिक, सार्वमौम, सिद्धान्त तथा भौतिक-सार्वमौम-सिद्धान्त में समन्वय स्थापित करने हेतु व्यक्ति से ब्रह्माण्ड स्तर तक के विवादमुक्त स्वरूप को व्यक्त करना।
(08) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित षोध संस्थाओं, अध्यात्मिक पर्यटन स्थलो, उद्देष्यो की पूर्ति हेतु विष्वमानक आधारित उपासना स्थलों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, विष्वविद्यालयों या अन्य प्रकार के षैक्षिक - तकनीकी संस्थानों की प्रतिश्ठा करना, उनका निर्वाह और परिचालन करना तथा उनकी सहायता करना।
(09) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित स्वस्थ एवं पूर्ण लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए संविधान, षिक्षा प्रणाली एवं अन्य सभी प्रणालियों के सत्य स्वरुप को परिभाशित कर उसकी स्थापना हेतु जनसाधारण, षासन, अन्य समितियों व सामाजिक - धार्मिक संगठन को प्रेरित करना व उनकी सहायता करना।
(10) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित स्वस्थ लोकतंत्र के धर्म एवं सभी धर्मो तथा उनके सभी धर्म ग्रन्थोे के सत्य और धर्म निरपेक्ष-सर्वधर्मसमभाव स्वरुप को व्यक्त करते हुये उनमें समभाव-समदृश्टि द्वारा समन्वय स्थापित करना ।
(11़) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित षारीरिक, आर्थिक, मानसिक व्याधियों की मुक्ति हेतु विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक चिकित्सा प्रणालियों को संचालित करना तथा नवीन प्रणालियों के विकास हेतू षोध व षिक्षण संस्थाओं की स्थापना करना ।
(12) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित साहित्य, संगीत, कला, दृष्य-श्रव्य माध्यम जैसे वृतचित्र, चलचित्र, विज्ञान, षास्त्र, मानवीय मूल्यों इत्यादि को विकसित करने वाले विशयों से सम्बन्धित गोश्ठी, सेमिनार, प्रदर्षनी व कार्यक्रम आयोजित कर ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देना तथा उस पर आधारित साहित्यों-षास्त्रों का प्रकाषन कर जन साधरण तक पहुॅचाकर षिक्षित समाज की परिकल्पना को साकार करना।
(13) मानव मन का एकीकरण अर्थात मानव मन का भूमण्डलीकरण एवं ब्रह्माण्डीयकरण पर आधारित मानवीय मूल्यों इत्यादि को विकसित करने वाले विशयों को बौद्धिक सम्पदा अधिनियम, काॅपीराइट अधिनियम, पेटेण्ट अधिनियम इत्यादि के अन्तर्गत पंजीकृत कराते हुये उस पर एकाधिकार रखना और उसे प्रसारित करने के योग्य बनाकर समान विचारधारा वाले ट्रस्ट/समिति को विक्रय या वितरण के लिए तय किये गये नियमानुसार उपलब्ध कराना।
(14) समाजोत्थान व कल्याणार्थ वृद्ध गृह, वृद्धा आश्रम, विकलांग विद्यालय, स्वास्थ्य मेला, सामूहिक विवाह, गौषाला, हैण्डीक्राफ्ट प्रषिक्षण इत्यादि संचालित करना।
(15) पिछड़े, अनुसूचित, अनुसूचित जन जाति व अल्पसंख्यक वर्ग के महिला एवं पुरूश को तकनीकी षिक्षण-प्रषिक्षण प्रदान करना।
(16) निराश्रित/बेसहारा महिला व अनाथ बच्चों के लिए षिक्षा, आश्रम एवं स्वरोजगार की व्यवस्था करना।
(17) उद्देष्य की प्राप्ति हेतू समान विचारधारा वाले ट्रस्ट/समिति का गठन कराना व उन्हें स्वायत्तता के साथ अधीनस्त करना।
(18) प्रादेषिक सरकार, भारत सरकार, अन्य देषो तथा संयुक्तराश्ट्र संघ द्वारा चलाये जा रहे समाजोपयोगी कार्यक्रम व उद्योगो से सम्बन्धित क्रार्यक्रम में भाग लेना तथा उनके द्वारा आयोजित प्रषिक्षणो को संचालित करना जो विषेश रुप से मानव संसाधन विकास से सम्बन्धित हों।
(19) उद्देष्यों की पूर्ति में सहायक होने वाले वृत-पत्रों और नियतकालीन पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों और पत्रको का मुद्रण और प्रकाषन करना, दृष्य-श्रव्य माध्यमों का निर्माण करना एवम् उनका निःषुल्क अथवा अन्य प्रकार से वितरण या विक्रय करना।
(20) ऐसे अन्य किसी कार्य का परिचालन करना जो उपरोक्त किसी भी उद्देष्य से सम्बन्धित हो तथा अपरोक्ष या परोक्ष रुप से उसकी पूर्ति में सहायक हो सकता हो उसे करना।


10. ट्रस्ट फण्ड:-

ट्रस्ट के लेखक द्वारा ट्रस्ट फण्ड के रुप में प्रदत्त रु0 5000/- की राषि प्रदान की गयी है और आषा की जाती है कि यह पूँजी सदैव बढ़ती रहेगी । ट्रस्टीगण ट्रस्ट के पूर्ति हेतू दान संग्रहीत करेंगें । ट्रस्टफण्ड / ट्रस्ट की सम्पत्ति निम्नानुसार रहेगी ।
ट्रस्ट फण्ड (जो ट्रस्ट के लेखक द्वारा दिया गया है)
दान दाताओं द्वारा प्रदत्त दान द्वारा ट्रस्ट फण्ड में अभिवृद्धि
ट्रस्ट फण्ड में बढ़ोत्तरी
ट्रस्ट फण्ड से प्राप्त चल-अचल सम्पत्तियाँ
ट्रस्ट के अधिकार में आने वाली चल-अचल सम्पत्तियाँ
ट्रस्ट को दान, अनुदान, उपहार के जरिये प्राप्त धनराषि

11. ट्रस्ट फण्ड का निवेष:-

ट्रस्ट मण्डल समय-समय पर ट्रस्ट फण्ड का निवेष बैकों, पोस्ट आॅफिस तथा आयकर अधिनियम 1961 की धारा 11(5) एवं सम्बन्धित न्यास अधिनियम अथवा उपरोक्त प्रावधानों के यथासमय संषोधित या परिवर्तित प्रावधानो के अन्र्तगत निर्दिश्ट मदो में ही कर सकेगा। इन विनियोगो का संचालन जिस प्रकार ट्रस्ट के खातों का संचालन किया जाना है, उसी प्रकार किया जा सकेगा । ट्रस्ट फण्ड से ट्रस्ट के उद्देष्यों की पूर्ति हेतू समय-समय पर अचल सम्पत्तियों का क्रय एवं निर्माण भी किया जा सकेगा।


12. बैंक खाता एवं उनका संचालन:-

ट्रस्ट के बैंक खाते ट्रस्ट के नाम पर किसी भी राश्ट्रीयकृत, अनुसूचित अथवा सहकारी बैंक अथवा पोस्ट आॅफिस में खोले जायेंगें। इनका संचालन लेखक ट्रस्टी एवं ट्रस्ट मण्डल द्वारा अधिकृत ट्रस्टी के संयुक्त हस्ताक्षरों से किया जायेगा। आवष्यकता होने पर ट्रस्ट मण्डल नामित ट्रस्टी में फेर बदल भी सर्वानुमति अथवा बहुमत से कर सकेगा । ट्रस्ट की चल-अचल सम्पत्तियों, सोने-चाँदी, जेवरात वगैरह की सुरक्षा के लिए बैंक में लाॅकर किराये पर लिये जा सकेंगे और ऐसे लाॅकरों का संचालन भी बैंक खातों के संचालन के अनुसार किया जा सकेगा।

13. ट्रस्ट के आय-व्यय एवं सम्पत्ति का रखरखाव:-

स्थापित ट्रस्ट चूँकि चैरिटेबल प्रकृति का है और दान से संग्रहित धन द्वारा संचालित होगा अतः इसका सही-सही हिसाब-किताब रखना अति आवष्यक होगा। ट्रस्ट के अभिलेख, लेखाबहियाँ एवं सभी हिसाब-किताब हेतू वित्तीय वर्श के अनुसार आय-व्यय एवं सम्पत्ति के स्थिति का विवरण हर वर्श वित्तीय वर्श की समाप्ति पर बनाना आवष्यक होगा । ऐसे हिसाब किताब की जाँच ट्रस्ट मण्डल द्वारा नियुक्त प्रपत्रिक लेखाकार (चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट) से कराया जायेगा। ट्रस्ट का समस्त हिसाब-किताब ट्रस्ट के मुख्य कार्यालय में रखा जायेगा। ट्रस्ट के परिसम्पदाओं का उपयोग व्यक्तिगत उपयोग में ट्रस्टीयों द्वारा नहीं किया जायेगा। ट्रस्ट का सम्पूर्ण हिसाब-किताब (आय-व्यय ब्वौरा एवं स्थिति विवरण) एवं चल-अचल सम्पत्तियों का प्रमाणिक विवरण ट्रस्ट की निधाग्रित मिटिंग में स्वीकृत किये जाने के पष्चात् सम्पूर्ण हिसाब-किताब बुलायी गयी निर्धारित सामान्य सभा की बैठक में अनुमोदन हेतू प्रस्तुत किया जायेगा और ऐसी बैठक प्रति वर्श की जायेगी। ट्रस्ट के द्वारा आवक-जावक व आय-व्यय इत्यादि से सम्बन्धित पूरा हिसाब-किताब खर्चो के बिल्स व वाउचरों के साथ रखा जायेगा । अनुदान / दान प्राप्ति हेतू रसीदें रखी जायेंगी, जो अनुदान / दान प्राप्ति पर तत्काल जारी किया जायेगा। नगद राषि के अतिरिक्त जो भी अन्य सामान दान के रुप में प्राप्त होंगें उनकी भी अलग से रसीदें जारी की जायेगी। नित्य प्रति के फुटकर खर्चो के लिए भी अत्यल्प राषि का धन रखा जायेगा और षेश राषियाॅ अधिकृत बैंक खातों में ही रखी जायेंगी। ट्रस्ट के हिसाब-किताब का रख-रखाव आयकर अधिनियम एवं ट्रस्ट के अधिनियमों के प्राविधानों के अनुरुप किया जायेगा।

14. आयकर विभाग / राज्य में लागू सार्वजनिक न्यास अधिनियम व अन्य कानूनों का अनुपालन:-
ट्रस्ट अपने राज्य में लागू सार्वजनिक न्यास अधिनियम एवं प्रचलित कानूनों के अन्तर्गत आयकर विभाग में आवष्यकतानुसार पंजीकृत करायेगा और नियमानुसार समय-समय पर आयकर रिटर्न, अग्रिम आयकर दाखिल व जमा करेगा और सभी सरकारी कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करता रहेगा। इस हेतू समय-समय पर कानूनविदों की सलाह व मार्गदर्षन भी प्राप्त कर सकेगा। दान / अनुदान प्राप्ति की सामान्य रसीदों के अतिरिक्त ट्रस्ट के उद्देष्य एवं कार्यक्रमों के अनुरुप भवन, विद्यालय, षोध संस्थान, चिकित्सालय, बाल संस्कार केन्द्र, वाचनालय, छात्रावास के निर्माण हेतू प्राप्त दान के विरुद्ध अस्थायी निधि (काॅर्पस) की रसीदें अलग से आयकर कानून के प्राविधानों के अनुसार जारी किया जायेगा। इस स्थायी निधि में प्राप्त धन का उपयोग उपरोक्त घोशित मदों में ही किया जा सकेगा। ट्रस्ट आयकर अधिनियम के प्राविधानों के अन्र्तगत छूट सम्बन्धित कार्यवाही भी कर सकेगा। ट्रस्ट के नाम पर किये गये कोई भी गैर कानूनी कार्य हेतू ट्रस्ट के बजाए सम्बन्धित व्यक्ति ही जबाबदेह व जिम्मेदार होगा।

15. ट्रस्ट की मिटिंग:-

ट्रस्ट के कार्यों के संचालन के लिए प्रत्येक वर्श में चार त्रैमासिक मिटिंग अवष्य होगा, जिसकी सूचना नियत समय के पाँच दिन पूर्व सभी ट्रस्टियों को लेखक ट्रस्टी अथवा नामित सहायक ट्रस्टी द्वारा भेजी जायेगी। ऐसी बैठकें ट्रस्ट के मुख्य कार्यालय में ही बुलाई जायेगी। आवष्यक समझे जाने पर ऐसी बैठकों में ट्रस्टीगण के अतिरिक्त अन्य परिजनों, ट्रस्ट मण्डल द्वारा गठित समिति, उप समिति के पदाधिकारियों व सदस्यों को भी आमंत्रित सदस्य के रुप में बुलाया जा सकेगा । ट्रस्टियों की सहमति से पाँच दिन की पूर्व सूचना के बगैर भी आकस्मिक बैठक बुलायी जा सकेगी। ट्रस्ट की मीटिंग में कोरम पूर्ति हेतू दो तिहाई ट्रस्टियों की उपस्थ्तिि आवष्यक होगी। कोरम पूरा न होने पर पुनः बुलाई गयी मीटिंग में कोरम पूरा न होने पर भी मीटिंग स्थगित नहीं होगी और कम से कम आधे ट्रस्टियों की उपस्थिति में बैठक की कार्यवाही पूरी की जा सकेगी। लेखक ट्रस्टी मीटिंग का अध्यक्ष होगा, उसके सकारण अनुपस्थिति में नामित ट्रस्टी मीटिंग की अध्यक्षता करेगा। प्रस्ताव के पक्ष एवं विपक्ष में बराबरी के मत होने की स्थिति में मीटिंग के अध्यक्ष को निर्णायक मत देने का अधिकार होगा। ट्रस्ट की मीटिंग में पारित प्रस्तावों एवं निर्णयों को नियमित रुप से रखे गये कार्यवाही रजिस्टर में दर्ज किया जायेगा।

16. ट्रस्टीगण का अधिकार एवं कत्र्तव्य:-

ट्रस्टीगण के निम्नलिखित अधिकार व कत्र्तव्य होगें।
ट्रस्ट के सभी सम्पत्तियों और व्यापार का प्रबन्ध करना।
ट्रस्ट का प्रबन्ध देखना।
ट्रस्ट के नाम बैंक में खाता खोलना व नियमानुसार संचालित करना।
ट्रस्ट को नगद, उपहार या किसी प्रकार के मिलने वाले सहयोग जो ट्रस्ट के विकास में हो, को प्राप्त करना।
किसी कार्य के लिए प्रतिनिधि नियुक्त करना।
कार्य के लिए पदाधिकारीयों, कर्मचारियों इत्यादि की नियुक्ति करना तथा उनकी सेवा का नियम व वेतन या मानदेय निर्धारित करना।
ट्रस्ट फण्ड को कम्पनी के षेयर, बैंक, चल, अचल सम्पत्ति इत्यादि में निवेष करना।
लेन या ऋृण के लिए ट्रस्ट सम्पत्ति को बंधक रखना।
किसी अन्य कम्पनी के साथ साझेदारी करना।
ट्रस्ट सम्पत्ति को बेचना, सम्पत्ति खरीदना, निर्माण करना, बदला और पुनः निवेष करना।
ट्रस्ट सम्पत्ति व कार्य से सम्बन्धित सभी कर, अतिक्ति कर, प्रषासनिक, प्रबन्धकीय खर्चो का भुगतान करना।
ट्रस्ट के किसी भी प्रकार के विवाद को न्यायालय में दाखिल करना व उसको कानून के अनुसार देखना।
आवष्यकता पड़ने पर कानूनी सलाह व चार्टर एकाउन्टेन्ट की सहायता लेना।

17. ट्रस्ट के विलय सम्बन्धी:-

आवष्यकता होने पर ट्रस्ट मण्डल द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव के जरिये समान उद्देष्य वाले किसी अन्य ट्रस्ट का इस ट्रस्ट में या इस ट्रस्ट का अन्य ट्रस्ट में विलय सभी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करके किया जा सकेगा। विलय की स्थिति में विलीन होने वाले ट्रस्ट की सारी चल एवं अचल सम्पत्ति विलेय ट्रस्ट की हो जायेगी, एवं समस्त अभिलेखों में आवष्यक परिवर्तन विलेय ट्रस्ट के पक्ष में करा दिये जायेगें ।  

लेखक ट्रस्टी की घोशणा

मैं, चन्द्रेष कुमार (मुख्य प्रबन्ध ट्रस्टी), लेखक ट्रस्टी एतद्द्वारा घोशणा करता हूँ कि मैंने उपरोक्त ट्रस्ट की स्थापना, गठन एवं निर्माण बिना किसी अनुचित बाहरी दबाव के स्वस्थ मनः स्थिति से आज दिनांक 5 अक्टुबर सन् 2010 दिन मंगलवार (विष्व षिक्षक दिवस) को किया है, जो लिखित रुप से उपर्युक्तानुसार है।

नोट - मुबलिग 5000/- रूपये पर नियमानुसार मु0 600/- रूपये का स्टाम्प षुल्क अदा किया जा रहा है।


संस्थापक एवं लेखक ट्रस्टी का नाम व पूरा पता
श्री चन्द्रेष कुमार (मुख्य प्रबन्ध ट्रस्टी) पुत्र श्री झुल्लन प्रसाद निवासी ग्राम-रामजीपुर, पो0-पुरुशोत्तमपुर, थाना-अदलहाट, तहसील-चुनार, जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231305

तहरीर  तारीख:- बुधवार, 6 अक्टूबर, 2010

गवाहान:-

1 -   नाम:
पिता का नाम:
पूरा पता:

हस्ताक्षर:

2 -   नाम:
पिता का नाम:
पूरा पता:

हस्ताक्षर:

मसविदाकर्ता:-

टाइपकर्ता:- षिवा कम्प्यूटर एण्ड फोटोस्टेट, नरायनपुर, मीरजापुर

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