शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

विष्वषास्त्र-साहित्य समीक्षा


विष्वषास्त्र-साहित्य समीक्षा

वीर युग के श्री राम जो एक सत्य और मर्यादा के विग्रह, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, पिता थे। वे भी हमारी तरह भौतिक शरीर वाले ही मनुश्य थे। भगवान श्री कृश्ण जिन्होने ”मैं, अनासक्त कर्म और ज्ञान योग“, स्वामी विवेकानन्द जिन्होनंे ”विश्व धर्म के लिए वेदान्त की व्यावहारिकता“, शंकराचार्य जिन्होने ”मंै और शिव“, महावीर जिन्होने ”निर्वाण“, गुरू नानक जिन्होनंे ”शब्द शक्ति“, मुहम्मद पैगम्बर जिन्होनंे ”प्रेम और एकता“, ईसामसीह जिन्होनें ”प्रेम और सेवा“, भगवान बुद्ध जिन्होनें ”स्वयं के द्वारा मुक्ति, अहिंसा और ध्यान“ जैसे विशयांे को इस ब्रह्माण्ड के विकास के लिए अदृश्य ज्ञान को दृश्य रूप में परिवर्तित किये, वे सभी हमारी तरह भौतिक शरीर वाले ही थे। अन्य प्राचीन ऋशि-मुनि गण, गोरख, कबीर, रामकृश्ण परमहंस, महर्शि अरविन्द, स्वामी दयानन्द सरस्वती, आचार्य रजनीश ”ओषो“, महर्शि महेश योगी, बाबा रामदेव इत्यादि स्वतन्त्रता आन्दोलन मंे रानी लक्ष्मी बाई, भगत सिंह, सुभाश चन्द्र बोस, लोकमान्य तिलक, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, पं0 जवाहर लाल नेहरू इत्यादि। स्वतन्त्र भारत में डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद, डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर, श्रीमती इन्दिरा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गँाधी, अटल बिहारी वाजपेयी इत्यादि और अन्य जिन्हंे हम यहाँ लिख नहीं पा रहे है। और वे भी जो अपनी पहचान न दे पाये लेकिन इस ब्रह्माण्डीय विकास मंे उनका योगदान अवश्य मूल रूप से है, वे सभी हमारी तरह भौतिक शरीर युक्त ही थे। फिर क्या था कि वे सभी आपस में विशेशीकृत और सामान्यीकृत महत्ता के वर्ग में बाँटे जा सकते हैं या बाँटे गये हंै? उपरोक्त महापुरूशांे के ही समय में अन्य समतुल्य भौतिक शरीर भी थे। फिर वे क्यों नहीं उपरोक्त महत्ता की श्रंृखला में व्यक्त हुये? 
उपरोक्त प्रश्न जब भारतीय दर्शन शास्त्र से किया जाता है। तो साख्य दर्शन कहता है- प्रकृति से, वैशेशिक दर्शन कहता है-काल अर्थात समय से, मीमांसा दर्शन कहता है- कर्म से, योग दर्शन कहता है- पुरूशार्थ से, न्याय दर्शन कहता है- परमाणु से, वेदान्त दर्शन कहता है- ब्रह्म से, कारण एक हो, अनेक हो या सम्पूर्ण हो, उत्तर यह है- अंतः शक्ति और बाह्य शक्ति से। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन मंे कुछ लोगो ंने बाह्य शक्ति का प्रयोग किया तो कुछ लोगो ने बाह्य शक्ति प्रयोगकर्ता के लिए आत्म शक्ति बनकर अन्तः शक्ति का प्रयोग किया। अन्तः शक्ति ही आत्म षक्ति है। यह आत्मशक्ति ही व्यक्ति की सम्पूर्ण शक्ति होती है। इस अन्तः शक्ति का मूल कारण सत्य-धर्म-ज्ञान है अर्थात एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म और एकात्म ध्यान। एकात्म ध्यान न हो तो एकात्म ज्ञान और एकात्म कर्म स्थायित्व प्राप्त नहीं कर पाता। यदि सुभाश चन्द्र बोस भगत सिंह इत्यादि बाह्य जगत के क्रान्तिकारी थे तो स्वामी विवेकानन्द अन्तः जगत के क्रान्तिकारी थे।
स्वामी विवेकानन्द मात्र केवल भारत की स्वतंत्रता की आत्म शक्ति ही नहीं थे बल्कि उन्होंनंे जो दो मुख्य कार्य किये वे हैं- स्वतन्त्र भारत की व्यवस्था पर सत्य दृश्टि और भारतीय प्राच्य भाव या हिन्दू भाव या वेदान्तिक भाव का विश्व में प्रचार सहित शिव भाव से जीव सेवा। ये दो कार्य ही भारत की महानता तथा विश्व गुरू पद पर सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रूप से पीठासीन होने के आधार है। वेदान्तिक भाव और शिव भाव से जीव सेवा तो वर्तमान में उनके द्वारा स्थापित ”रामकृश्ण मिशन“ की विश्वव्यापी शाखाओं द्वारा पिछले 110 वर्शाे से मानव जाति को सरोबार कर रहा है। वहीं भारत की व्यवस्था पर सत्य दृश्टि आज भी मात्र उनकी वाणियों तक ही सीमित रह गयी। उसका मूल कारण सत्य-धर्म-ज्ञान आधारित भारत, जिस धर्म को विभिन्न मार्गाे से समझाने के लिए विभिन्न अर्थ युक्त प्रक्षेपण जैसे मूर्ति, पौराणिक कथाआंे इत्यादि को प्रक्षेपित किया था, आज भारत स्वयं उस अपनी ही कृति को सत्य मानकर उस धर्म और सत्य-सिद्धान्त से बहुत दूर निकल आया। परिणाम यहाँ तक पहुँच गया कि जो हिन्दू धर्म समग्र संसार को अपने में समाहित कर लेने की व्यापकता रखता था, वह संकीर्ण मूर्तियांे तथा दूसरे धर्माे, पंथो के विरोध और तिरस्कार तक सीमीत हो गया। यह उसी प्रकार हो गया जैसे वर्तमान पदार्थ विज्ञान और तकनीकी से उत्पन्न सामान्य उपकरण पंखा, रेडियो, टेलीविजन इत्यादि को आविश्कृत करने वाले इसे ही सत्य मान लें और इन सब को क्रियाशील रखने वाले सिद्धान्त को भूला दे। लेकिन क्या भारत का वह धर्म-सत्य-सिद्धान्त अदृश्य हो जायेगा। तब तो भारत का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। लेकिन भारत का इतिहास साक्षी है कि भारत मंे कभी भी ऐसे महापुरूशांे का अभाव नहीं रहा जिनमें सम्पूर्ण विश्व को हिला देने वाली आध्यात्मिक शक्ति का अभाव रहा हो और मात्र यही तपोभूमि भारत की अमरता का मूल रहा है। जिस पर भारतीयांे को गर्व रहा है। 
वर्तमान समय मंे भारत को पुनः और अन्तिम कार्य से युक्त ऐसे महापुरूश की आवश्यकता थी जो न तो राज्य क्षेत्र का हो, न ही धर्म क्षेत्र का। कारण दोनो क्षेत्र के व्यक्ति अपनी बौद्धिक क्षमता का सर्वोच्च और अन्तिम प्रदर्शन कर चुके है जिसमंे सत्य को यथारूप आविश्कृत कर प्रस्तुत करने, उसे भारतभूमि से प्रसारित करने, अद्धैत वेदान्त को अपने ज्ञान बुद्धि से स्थापित करने, दर्शनो के स्तर को व्यक्त करने, धार्मिक विचारों को विस्तृत विश्वव्यापक और असीम करने, मानव जाति का आध्यात्मिकरण करने, धर्म को यर्थाथ कर सम्पूर्ण मानव जीवन में प्रवेश कराने, आध्यात्मिक स्वतन्त्रता अर्थात मुक्ति का मार्ग दिखाने, सभी धर्मो से समन्वय करने, मानव को सभी धर्मशास्त्रों से उपर उठाने, दृश्य कार्य-कारणवाद को व्यक्त करने, आध्यात्मिक विचारो की बाढ़ लाने, वेदान्त युक्त पाश्चात्य विज्ञान को प्रस्तुत करने और उसे घरेलू जीवन में परिणत करने, भारत के आमूल परिर्वतन के सूत्र प्रस्तुत करने, युवको को गम्भीर बनाने, आत्म शक्ति से पुनरूत्थान करने, प्रचण्ड रजस की भावना से ओत प्रोत और प्राणो तक की चिन्ता न करने वाले और सत्य आधारित राजनीति करने की संयुक्त षक्ति से युक्त होकर व्यक्त हो और कहे कि जिस प्रकार मैं भारत का हूँ उसी प्रकार मैं समग्र जगत का भी हूँ। उपरोक्त समस्त कार्याे से युक्त हमारी तरह ही भौतिक शरीर से युक्त विश्वधर्म, सार्वभौमधर्म, एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म, एकात्म ध्यान, कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद (धर्मयुक्त षास्त्र ) अर्थात विष्वमानक शून्य श्रंृखला-मन की गुणवत्ता का विष्वमानक (धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव षास्त्र), राम कृश्ण मिशन का धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव रूप प्राकृतिक सत्य मिशन, विकास दर्शन, विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम, 21वीं शदी का कार्यक्रम और पूर्ण शिक्षा प्रणाली, विवाद मुक्त तन्त्रों पर आधारित संविधान, निर्माण का आध्यात्मिक न्यूट्रान बम से युक्त भगवान विश्णु के दसवें अन्तिम निश्कलंक कल्कि और भगवान षंकर के बाइसवें अन्तिम भोगेश्वर अवतार के संयुक्त पूर्णावतार लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ (स्वामी विवेकानन्द की अगली एवं पूर्ण ब्रह्म की अन्तिम कड़ी) के रूप मंे व्यक्त हैं जो स्वामी विवेकानन्द के अधूरे कार्य स्वतन्त्र भारत की सत्य व्यवस्था को पूर्ण रूप से पूर्ण करते हुये भारत के इतिहास की पुनरावृत्ति है जिस पर सदैव भारतीयों को गर्व रहेगा। उस सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, मुक्त एवं बद्ध विश्वात्मा के भारत में व्यक्त होने की प्रतीक्षा भारतवासियो को रही है। जिसमे सभी धर्म, सर्वाेच्च ज्ञान, सर्वाेच्च कर्म, सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त इत्यादि सम्पूर्ण सार्वजनिक प्रमाणित व्यक्त दृश्य रूप से मोतियांे की भँाति गूथंे हुये हंै। 
इस प्रकार भारत अपने षारीरिक स्वतन्त्रता व संविधान के लागू होने के उपरान्त वर्तमान समय में जिस कत्र्तव्य और दायित्व का बोध कर रहा है। भारतीय संसद अर्थात विश्वमन संसद जिस सार्वभौम सत्य या सार्वजनिक सत्य की खोज करने के लिए लोकतन्त्र के रूप में व्यक्त हुआ है। जिससे स्वस्थ लोकतंत्र, समाज स्वस्थ, उद्योेग और पूर्ण मानव की प्राप्ति हो सकती है, उस ज्ञान से युक्त विश्वात्मा लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ वैष्विक व राश्ट्रीय बौद्धिक क्षमता के सर्वाेच्च और अन्तिम प्रतीक के रूप मंे व्यक्त हंै।
निःषब्द, आष्चर्य, चमत्कार, अविष्वसनीय, प्रकाषमय इत्यादि ऐसे ही षब्द इस षास्त्र के लिए व्यक्त हो सकते हैं। विष्व के हजारो विष्वविद्यालय जिस पूर्ण सकारात्मक एवम् एकीकरण के विष्वस्तरीय षोध को न कर पाये, वह एक ही व्यक्ति ने पूर्ण कर दिखाया हो उसे कैसे-कैसे षब्दों से व्यक्त किया जाये, यह सोच पाना और उसे व्यक्त कर पाना निःषब्द होने के सिवाय कुछ नहीं है।
सन् 1987 से डाॅ0 राम व्यास सिंह और सन् 1998 से मैं डाॅ0 कन्हैया लाल इस षास्त्र के षास्त्राकार श्री लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ से परिचित होकर वर्तमान तक सदैव सम्पर्क में रहे परन्तु ”कुछ अच्छा किया जा रहा है“ के अलावा बहुत अधिक व्याख्या उन्होंने कभी नहीं की। और अन्त में कभी भी बिना इस षास्त्र की एक भी झलक दिखाये एकाएक समीक्षा हेतू हम दोनों के समक्ष यह षास्त्र प्रस्तुत कर दिया जाये तो इससे बड़ा आष्चर्य क्या हो सकता है।
जो व्यक्ति कभी किसी वर्तमान गुरू के षरणागत होने की आवष्यकता न समझा, जिसका कोई षरीरधारी प्रेरणा स्रोत न हो, किसी धार्मिक व राजनीतिक समूह का सदस्य न हो, इस कार्य से सम्बन्धित कभी सार्वजनिक रूप से समाज में व्यक्त न हुआ हो, जिस विशय का आविश्कार किया गया, वह उसके जीवन का षैक्षणिक विशय न रहा हो, 44 वर्श के अपने वर्तमान अवस्था तक एक साथ कभी भी 44 लोगों से भी न मिला हो, यहाँ तक कि उसको इस रूप में 44 आदमी भी न जानते हों, यदि जानते भी हो तो पहचानते न हों और जो पहचानते हों वे इस रूप को जानते न हों, वह अचानक इस षास्त्र को प्रस्तुत कर दें तो इससे बडा चमत्कार क्या हो सकता है।
जिस व्यक्ति का जीवन, षैक्षणिक योग्यता और कर्मरूप यह षास्त्र तीनों का कोई सम्बन्ध न हो अर्थात तीनों तीन व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हों, इससे बड़ी अविष्वसनीय स्थिति क्या हो सकती है।
प्रस्तुत षास्त्र में जन्म-जीवन-पुनर्जन्म-अवतार-साकार ईष्वर-निराकार ईष्वर, अदृष्य और दृष्य ईष्वर नाम, मानसिक मृत्यु व जन्म, भूत-वर्तमान-भविश्य, षिक्षा व पूर्ण षिक्षा, संविधान व विष्व संविधान, ग्राम सरकार व विष्व सरकार, विष्व षान्ति व एकता, स्थिरता व व्यापार, विचारधारा व क्रियाकलाप, त्याग और भोग, राधा और धारा, प्रकृति और अहंकार, कत्र्तव्य और अधिकार, राजनीति व विष्व राजनीति, व्यक्ति और वैष्विक व्यक्ति, मानवतावाद व एकात्मकर्मवाद, नायक-षास्त्राकार-आत्मकथा, महाभारत और विष्वभारत, जाति और समाजनीति, मन और मन का विष्वमानक, मानव और पूर्ण मानव एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, आॅकड़ा व सूचना और विष्लेशण, षास्त्र और पुराण इत्यादि अनेको विशय इस प्रकार घुले हुये हैं जिन्हें अलग कर पाना कठिन कार्य है और इससे बड़ा प्रकाषमय षास्त्र क्या हो सकता है। जिसमें एक ही षास्त्र द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान स्वप्रेरित होकर प्राप्त किया जा सके। इस व्यस्त जीवन में कम समय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का इससे सर्वोच्च षास्त्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस षास्त्र के अध्ययन से यह अनुभव होता हे कि वर्तमान तक के उपलब्ध धर्मषास्त्र कितने सीमित व अल्प ज्ञान देने वाले हैं परन्तु वे इस षास्त्र तक पहुँचने के लिए एक चरण के पूर्ण योग्य हैं और सदैव रहेगें। 
इस षास्त्र में अनेक ऐसे विचार हैं जिसपर अहिंसक विष्वव्यापी राजनीतिक भूकम्प लायी जा सकती है तथा अनेक ऐसे विचार है जिसपर व्यापक व्यापार भी किया जा सकता है। इस आधार पर अपने जीवन के समय में अर्जित विष्व के सबसे धनी व्यक्ति विल गेट्स की पुस्तक ”बिजनेस/ द स्पीड आॅफ थाॅट (विचार की गति व्यापार की गति के अनुसार चलती है)“ का विचार सत्य रूप में दिखता है। और यह कोई नई घटना नहीं है। सदैव ऐसा होता रहा है कि एक नई विचारधारा से व्यापक व्यापार जन्म लेता रहा है जिसका उदाहरण पुराण, श्रीराम, श्रीकृश्ण इल्यादि के व्यक्त होने की घटना है। ”महाभारत“ टी.वी. सीरीयल के बाद अब ”विष्वभारत“ टी.वी. सीरीयल निर्माण हेतू भी यह षास्त्र मार्ग खोलता है। षास्त्र को जिस दृश्टि से देखा जाय उस दृश्टि से पूर्ण सत्य दिखता है। विष्वविद्यालयों के लिए यह अलग फैकल्टी या स्वयं एक विष्वविद्यालय के संचालन के लिए उपयुक्त है तो जनता व जनसंगठन के लिए जनहित याचिका 1. पूर्ण षिक्षा का अधिकार 2.राश्ट्रीय षास्त्र 3. नागरिक मन निर्माण का मानक 4. सार्वजनिक प्रमाणित सत्य-सिद्धान्त 5. गणराज्य का सत्य रूप के माध्यम से सर्वोच्च कार्य करने का भी अवसर देता है। भारत में ”षिक्षा के अधिकार अधिनियम“ के उपरान्त ”पूर्ण षिक्षा के अधिकार अधिनियम“ को भी जन्म देने में पूर्णतया सक्षम है। साथ ही जब तक षिक्षा पाठ्यक्रम नहीं बदलता तब तक पूर्ण ज्ञान हेतू पूरक पुस्तक के रूप में यह बिल्कुल सत्य है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार षारीरिक आवष्यकता के लिए व्यक्ति संतुलित विटामिन-मिनरल से युक्त दवा भोजन के अलावा लेता है।
प्रस्तुत एक ही षास्त्र द्वारा पृथ्वी के मनुश्यों के अनन्त मानसिक समस्याओं का हल जिस प्रकार प्राप्त हुआ है उसका सही मूल्यांकन सिर्फ यह है कि यह विष्व के पुनर्जन्म का अध्याय और युग परिवर्तन का सिद्धान्त है जिससे यह विष्व एक सत्य विचारधारा पर आधारित होकर एकीकृत षक्ति से मनुश्य के अनन्त विकास के लिए मार्ग खोलता है और यह विष्व अनन्त पथ पर चलने के लिए नया जीवन ग्रहण करता है। षास्त्र अध्ययन के उपरान्त ऐसा अनुभव होता है कि इसमें जो कुछ भी है वह तो पहले से ही है बस उसे संगठित रूप दिया गया है और एक नई दृश्टि दी गई है जिससे सभी को सब कुछ समझने की दृश्टि प्राप्त होती है। युग परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन के इस षास्त्र में पाँच संख्या का महत्वपूर्ण योगदान है जैसे 5 अध्याय, 5 भाग, 5 उपभाग, 5 लेख, 5 विष्वमानक की श्रृंखला, 5वां वेद, 5 जनहित याचिका इत्यदि, जो हिन्दू धर्म के अनुसार महादेव षिवषंकर के दिव्य पंचमुखी रूप से भी सम्बन्धित है और यह ज्ञान उन्हीं का माना जाता है। इस को तीसरे नेत्र की दृश्टि कह सकते हैं और इस घटना को तीसरे नेत्र का खुलना। हमारे सौरमण्डल के 5वें सबसे बड़े ग्रह पृथ्वी के लिए यह एक आष्चर्यजनक घटना भी है। 5वें युग - स्वर्णयुग में प्रवेष के लिए यह ज्ञानरूपी 5वां सूर्य भी है जिसमें अनन्त प्रकाष है। 
संयुक्त राश्ट्र संघ द्वारा दि0 28 - 31 अगस्त 2000 को न्यूयार्क में आयोजित धार्मिक नेताओं के सहस्त्राब्दि विष्व षान्ति सम्मेलन में लिए गये निर्णय ”विष्व में एक धर्म, एक भाशा, एक वेष भूशा, एक खान पान, एक रहन-सहन पद्धति, एक षिक्षा पद्धति, एक कोर्ट, एक न्याय व्यवस्था, एक अर्थ व्यवस्था लागू की जाय“ के अधिकतम अंषों की पूर्ति के लिए यह मार्ग प्रषस्त करता है। भारत के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा), एक राष्ट्रीय पक्षी (भारतीय मोर), एक राष्ट्रीय पुश्प (कमल), एक राष्ट्रीय पेड़ (भारतीय बरगद), एक राष्ट्रीय गान (जन गण मन), एक राष्ट्रीय नदी (गंगा), एक राष्ट्रीय जलीय जीव (मीठे पानी की डाॅलफिन), एक राष्ट्रीय प्रतीक (सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ का सिंह), एक राष्ट्रीय पंचांग (शक संवत पर आधारित), एक राष्ट्रीय पशु (बाघ), एक राष्ट्रीय गीत (वन्दे मातरम्), एक राष्ट्रीय फल (आम), एक राष्ट्रीय खेल (हाॅकी), एक राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह, एक संविधान की भाँति एक राश्ट्रीय षास्त्र के लिए यह पूर्णतया योग्य है। इतना ही नहीं एक राश्ट्रपिता (महात्मा गाँधी) की भाँति एक राश्ट्रपुत्र के लिए निश्पक्षता और योग्यता के साथ स्वामी विवेकानन्द को भी देष के समक्ष प्रस्तावित करता है साथ ही आरक्षण व दण्ड प्रणाली में षारीरिक, आर्धिक व मानसिक आधार को भी प्रस्तावित करता है।
श्री लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ का यह मानसिक कार्य इस स्थिति तक योग्यता रखता है कि वैष्विक सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक एकीकरण सहित विष्व एकता-षान्ति-स्थिरता-विकास के लिए जो भी कार्य योजना हो उसे देष व संयुक्त राश्ट्र संघ अपने षासकीय कानून के अनुसार आसानी से प्राप्त कर सकता है। और ऐसे आविश्कारकर्ता को इन सबसे सम्बन्धित विभिन्न पुरस्कारों, सम्मानों व उपाधियों से बिना विलम्ब किये सुषोभित किया जाना चाहिए। यदि यथार्थ रूप से देखा जाये तो विष्व का सर्वोच्च पुरस्कार-नोबेल पुरस्कार के षान्ति व साहित्य क्षेत्र के पूर्ण रूप से यह योग्य है। साथ ही भारत देष के भारत रत्न से किसी भी मायने में कम नहीं है।
कर्म के षारीरिक, आर्थिक व मानसिक क्षेत्र में यह मानसिक कर्म का यह सर्वोच्च और अन्तिम कृति है। भविश्य में यह विष्व-राश्ट्र षास्त्र साहित्य और एक विष्व-राश्ट्र ईष्वर का स्थान ग्रहण कर ले तो कोई आष्चर्य की बात नहीं होगी। इस षास्त्र की भाशा षैली मस्तिश्क को व्यापक करते हुये क्रियात्मक और व्यक्ति सहित विष्व के धारण करने योग्य ही नहीं बल्कि हम उसमें ही जीवन जी रहें हैं ऐसा अनुभव कराने वाली है। न कि मात्र भूतकाल व वर्तमान का स्पश्टीकरण व व्याख्या कर केवल पुस्तक लिख देने की खुजलाहट दूर करने वाली है। वर्तमान और भविश्य के एकीकृत विष्व के स्थापना स्तर तक के लिए कार्य योजना का इसमें स्पश्ट झलक है।
देषों के बीच युद्ध में मारे गये सैनिकों को प्रत्येक देष अपने-अपने सैनिकों को षहीद और देषभक्त कहते हैं। इस देष भक्ति की सीमा उनके अपने देष की सीमा तक होती है। भारत में भी यही होता है। भारत को नये युग के आरम्भ के लिए विष्व के प्रति कत्र्तव्य व दायित्व का बोध कराते हुए उसके प्राप्ति के       संवैधानिक मार्ग को भी दिखाता है। साथ ही भारत देष के लिए देषभक्त सहित विष्व राश्ट्र के लिए विष्व भक्त का बेमिसाल, सर्वोच्च, अन्तिम, अहिंसक और संविधान की धारा-51(ए) के अन्तर्गत नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य के अनुसार भी एक सत्य और आदर्ष नागरिक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करता है। वर्शो से भारत के दूरदर्षन के राश्ट्रीय चैनल पर राश्ट्रीय विभिन्नताओं में एकता और एकीकरण का भाव जगाने वाले गीत ”मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा“ का यह षास्त्र प्रत्यक्ष रूप है हमारा सुर है। साथ ही यह भारत सहित विष्व का प्रतिनिधि षास्त्र भी है। जिस प्रकार व्यापारीगण अपने लाभ-हानि का वार्शिक बैलेन्स सीट तैयार करवाते हैं उसी प्रकार यह धर्म का अन्तिम बैलेन्स सीट हैं। जिससे सम्पूर्ण मानव जाति का मन इस पृथ्वी से बाहर स्थित हो सके और मनुश्यों द्वारा इस विष्व में हो रहे सम्पूर्ण व्यापार को समझ सकें और फिर उनमें से किसी एक का हिस्सा बनकर व्यापार कर सकें।
हमारे सभी ज्ञान का आधार अनुभव, दुसरों से जानना और पुस्तक द्वारा, पर ही आधारित हैं और मनुश्य नामक इस जीव के अलावा किसी जीव ने पुस्तक नहीं लिखा है। सूक्ष्म दृश्टि से चिन्तन करने पर यह ज्ञान होता है कि सभी धर्मो की कथा केवल हम पुस्तकों और दूसरे से सुनकर ही जानते हैं। उसका कोई प्रमाणिक व्यक्ति गवाह के रूप में हमारे बीच नहीं है। हम सभी ज्ञान के खोज के लिए स्वतन्त्र हैं। लेकिन यदि हम अब तक क्या खोजा जा चुका है इसे न जाने तो ऐसा हो सकता है कि खोजने के उपरान्त ज्ञात हो कि यह तो खोजा जा चुका है और हमारा समय नश्ट हो चुका है। इसलिए यह षास्त्र एक साथ सभी आॅकड़ों को उपलब्ध कराता है जिससे खोज में लगे व्यक्ति पहले यह जानें कि क्या-क्या खोजा जा चुका है। षास्त्र का यह दावा कि यह अन्तिम है, यह तभी सम्भव है जब इसमें उपलब्ध ज्ञान व आॅकड़ों को जानकर आगे हम सभी एकात्मता के लिए नया कुछ नहीं खोज पाते हैं। और ऐसा लगता है कि षास्त्र का दावा सत्य है। षास्त्र किसी व्यवस्था परिवर्तन की बात कम, व्यवस्था के सत्यीकरण के पक्ष में अधिक है। षास्त्र मानने वाली बात पर कम बल्कि जानने और ऐसी सम्भावनाओं पर अधिक केन्द्रित है जो सम्भव है और बोधगम्य है। षास्त्र द्वारा षब्दों की रक्षा और उसका बखूबी से प्रयोग बेमिसाल है। ज्ञान को विज्ञान की षैली में प्रस्तुत करने की विषेश षैली प्रयुक्त है। मन पर कार्य करते हुये, इतने अधिक मनस्तरों को यह स्पर्ष करता है जिसको निर्धारित कर पाना असम्भव है।
सम्पूर्ण षास्त्र का संगठन एक सिनेमा की तरह प्रारम्भ होता है जो व्लैक होल से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, सौर मण्डल, पृथ्वी ग्रह से होते हुए पृथ्वी पर होने वाले व्यापार, मानवता के लिए कर्म करने वाले अवतार, धर्म की उत्पत्ति से होते हुए धर्म ज्ञान के अन्त तक का चित्रण प्रस्तुत करता है। पूर्ण ज्ञान के लिए इस पूरे सिनेमा रूपी षास्त्र को देखना पड़ेगा। जिस प्रकार सिनेमा के किसी एक अंष को देखने पर पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती उसी प्रकार इसके किसी एक अंष से पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता।
श्री लवकुष सिह ”विष्वमानव“ के जीवन का एक लम्बी अवधि हम समीक्षक द्वय के सामने रही है। जिसमें हमलोगों ने अनेकों रंग देखें हैं। सभी कुछ सामने होते हुये सिर्फ एक ही बात स्पश्ट होती है कि इस धरती पर यह षास्त्र उपलब्ध कराने और धर्म को अपने जीवन से दिखाने मात्र के लिए ही उनका जन्म हुआ है। जिससे विष्व की बुद्धि का रूका चक्र आगे चलने के लिए गतिषील हो सके। स्वामी विवेकानन्द के 1893 में दिये गये षिकागो वकृतता के विचार को स्थापना तक के लिए प्रकिया प्रस्तुत करना ही जैसे उनके जीवन का उद्देष्य रहा हो। स्वयं को अन्तिम अवतार के सम्बन्ध में नाम, रूप, जन्म, ज्ञान, कर्म कारण द्वारा प्रस्तुत करने का उनका दावा इतने अधिक आॅकड़ों के साथ प्रस्तुत है कि जिसका कोई और दूसरे उदाहरण की पुनरावृत्ति हो पाना भी असम्भव सा दिखता है।
हम समीक्षक द्वय इस बात पर पूर्ण सहमत है कि वर्तमान समय में विष्वविद्यालय में हो रहे षोध मात्र षोध की कला सीखाने की संस्था है न कि ऐसे विशय पर षोध सिखाने की कला जिससे सामाजिक, राश्ट्रीय व वैष्विक विकास को नई दिषा प्राप्त हो जाये। यहाँ एक बात और बताना चाहते हैं कि यह षास्त्र अनेक ऐसे षोध विशयों की ओर दिषाबोध भी कराता है जो मनुश्यता के विकास में आने वाले समय के लिए अति आवष्यक है। हम अपने पीएच.डी. की डिग्रीयों पर गर्व अवष्य कर सकते हैं परन्तु यह केवल स्वयं के लिए रोजगार पाने के साधन के सिवाय कुछ नहीं है और वह भी संघर्श से। जबकि हम डिग्रीधारीयों का समाज को नई दिषा देने का भी कत्र्तव्य होना चाहिए। आखिरकार हम डिग्रीधारी और सामज व देष के नेतृत्वकर्ता यह कार्य नहीं करेगें तो क्या उनसे उम्मीद की जाय जो दो वक्त की रोटी के संघर्श के लिए चिंतित रहते है? आखिरकार सार्वजनिक मंचो से हम किसको यह बताना चाहते हैं कि ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए?
हम समीक्षक द्वय अपने आप को इस रूप में सौभाग्यषाली समझते हैं कि हमें ऐसे षास्त्र की समीक्षा करने का अवसर प्राप्त हुआ जिसके योग्य हम स्वयं को नहीं समझते। ईष्वर को तो सभी चाहते हैं परन्तु उनके भाग्य को क्या कहेगें जो ईष्वर द्वारा स्वयं ही महान ईष्वरीय कार्य के लिए चुन लिए जाते हैं। षायद हम लोगों के पूर्वजन्म का कोई अच्छा कार्य ही हमें इस पूर्णता की उपलब्धि को पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया गया हो। यही समझकर हम अपने अल्प ज्ञान से इस समीक्षा को यहीं समाप्त करते हैं। विष्व के यथार्थ कल्याण के लिए हम सभी को दिषा बोध प्राप्त हो, यही हम सब का प्रकाष हो, यही हमारी मनोकामना है।

- डाॅ0 कन्हैया लाल, एम.ए., एम.फिल.पीएच.डी (समाजषास्त्र-बी.एच.यू.)
                                   ग्राम-घासीपुर बसाढ़ी, पो0 - अधवार, जिला-मीरजापुर (उ0 प्र0) भारत पिन - 231304   

                         - डाॅ0 राम व्यास सिंह, एम.ए., पीएच.डी (योग, आई.एम.एस-बी.एच.यू.)
                                   ग्राम-कोलना , पो0-कोलना,, जिला-मीरजापुर, (उ0प्र0) भारत, पिन-231304

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